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भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने के लिए नीति आयोग के पास ये है ब्लूप्रिंट

नई दिल्ली: परमिट 45 दिनों के अंदर मिलने की तेज और प्रभावी प्रक्रिया, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए बिजली का कनेक्शन 15 दिनों के अंदर देना, 90 फीसदी भूमि अधिग्रहण काम या निर्माण कार्य शुरू होने से पहले पूरा होने की अनिवार्यता, मुकदमेबाजी घटाने और व्यवस्थित भूमि अधिग्रहण के लिए लैंड टाइटलिंग लॉ पर अमल.

ये कुछ ऐसे मुख्य बिंदु हैं जिन्हें भारत को ‘ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब’ बनाने और देश में जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए केंद्र और राज्यों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के बाद नीति आयोग की तरफ से तैयार रूपरेखा में शामिल किया गया है.

नीति निर्धारक थिंक टैंक ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 20 फरवरी को मुख्यमंत्रियों के साथ हुई एक निर्णायक बैठक से पहले इस माह के शुरू में राज्यों के साथ इस पर विस्तृत विचार-विमर्श किया था.

दिप्रिंट ने उस बैठक का एजेंडा डॉक्यूमेंट हासिल किया है, जिसे राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया था.

कारोबार करना आसान बनाने के उद्देश्य से राज्य स्तर पर अनुपालन घटाने की कोशिश के तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को सलाह दी गई है कि वे निवेश, रोजगार और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अपने संबंधित ‘चैंपियन सेक्टर’ में मंजूरी की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं की पहचान के लिए एक समर्पित कार्यबल गठित करें. यह कवायद 15 अगस्त तक पूरी करनी है.


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कारोबार में सुगमता

नीति आयोग द्वारा पांच राज्यों गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में किए गए एक विश्लेषण के मुताबिक, इन राज्यों में क्रमशः 2,736, 2,920, 2,136, 2,054 और 1,980 स्वीकृतियों की जरूरत पड़ती है.

नीति आयोग ने अपने दस्तावेज में कहा, ‘नियामक स्वीकृतियों का बोझ घटाना ईओडीबी (कारोबार में सुगमता) के लिए एक सबसे अहम चरण है और भारत को दुनिया का सबसे पसंदीदा निवेश स्थल बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है.’

इस संदर्भ में मंत्रालयों और विभागों को अपने सभी अधिनियमों और नियम-कायदों का विस्तृत मूल्यांकन करने की सलाह दी गई है.

दस्तावेज में कहा गया है, ‘नागरिकों और कारोबार के संबंध में प्रत्येक इंटरफेस की प्रासंगिकता और औचित्य का आकलन किया जाना चाहिए और जिन नियामक स्वीकृतियों की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है, उन्हें खत्म करने की जरूरत है.’

देशभर के सभी मंत्रालयों और विभागों को सलाह दी गई है कि आवश्यक कागजी कार्यवाही को तर्कसंगत बनाने का काम ‘नियमित अभ्यास’ का हिस्सा बनाएं जिसमें सिविल ऑफेंस के छोटे-मोटे मामलों को कानूनन अपराध की श्रेणी से बाहर करना, निरर्थक हो चुके कानूनों और प्रावधानों को हटाना और नियामक स्वीकृतियों का बोझ घटाने पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है.

यह पहल दो चरणों में लागू होने की उम्मीद है. राज्य जहां लाइसेंस, सर्टिफिकेट, नवीनीकरण, निरीक्षण, रजिस्टर और रिकॉर्ड, रिटर्न फाइलिंग आदि संबंधी बोझ घटाने के लिए 31 मार्च तक आवश्यक कदम उठा सकते हैं. वहीं पुराने पड़ चुके कानूनों को खत्म करने का काम 15 अगस्त तक पूरा होने की संभावना है.

हर राज्य से दो शहरों की पहचान करने को कहा गया है, जिन्हें निर्णायक प्रॉपर्टी टाइटल व्यवस्था की तरफ बढ़ते हुए लैंड टाइटलिंग लॉ लागू करके भूमि प्रशासन की गुणवत्ता में सुधार के जरिये बिजनेस हब के रूप में विकसित किया जा सके. इसके तहत कम से कम 30 सालों के रिकॉर्ड का डिजिटाइजेशन और ऑनलाइन एक्सेस के लिए इंटीग्रेटेड पोर्टल शुरू किया जाएगा.

राज्यों से साथ ही यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन बिल्डिंग परमिशन सिस्टम के जरिये 45 दिन के अंदर निर्माण का परमिट मुहैया कराने की तेज और कुशल प्रक्रिया विकसित करें. वे जोखिम के आधार पर वर्गीकरण का खाका बना सकते हैं जिससे कम जोखिम वाले निर्माण कार्यों के लिए जल्द मंजूरी मिल सके और बिजली के कॉमर्शियल कनेक्शन के लिए समयसीमा घटाकर 15 दिन की जाए.


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बुनियादी ढांचे को मजबूती देना

नीति आयोग के दस्तावेज में कहा गया है कि हालांकि, केंद्र सरकार ने नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन को रोलआउट किया है लेकिन भूमि मुहैया कराने और केंद्र या निजी क्षेत्र की अगुवाई वाली परियोजनाओं के मामले में मंजूरियां देने में राज्यों की अहम भूमिक होगी.

इसलिए, राज्यों को बड़ी परियोजनाओं में बोली लगाने का एक कुशल और भरोसेमंद तंत्र विकसित करने की सलाह दी गई है, जिसमें भूमि अधिग्रहण और मंजूरी या अनुमोदन को स्पेशल पर्पज व्हीकल के तौर पर शामिल किया जाएगा जिसके बाद ही बोली लगाई जा सकेगी.

इसके अलावा, उन्हें सलाह दी गई है कि सभी प्रोजेक्ट में काम करने या निर्माण शुरू करने से पहले कम से कम 90 फीसदी जमीन की उपलब्धता सुनिश्चित करें.

कुछ असहमतियां गंभीर रूप लेकर ऐसे विवाद में न बदल जाएं जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट ही पटरी से उतर सकता हो, इससे बचने के लिए राज्यों को हर स्तर पर विवाद निपटारे के लिए प्रभावी संस्थागत ढांचा तैयार करने को कहा गया है.

जिन कदमों की सिफारिश की गई है, उनमें निर्माण के दौरान उठ सकने वाले मुद्दों से निपटने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सभी अनुबंधों में एक स्वतंत्र इंजीनियर की नियुक्ति करना, राज्य स्तर पर हाई कोर्ट के एक जज समेत तीन स्वतंत्र विशेषज्ञों वाली दो या तीन सुलह समितियां बनाकर विवाद निपटारा तंत्र स्थापित करना और दीवानी अदालतों को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत के तौर पर नामित करना शामिल है.

नीति अयोग ने सभी राज्यों से कारोबार की लॉजिस्टिक कास्ट घटाने के उपाय करने को भी कहा है. दस्तावेज के मुताबिक, ट्रक ड्राइवरों की खासी कमी (28-30 प्रतिशत अनुमानित) है, जिसका नतीजा बड़े पैमाने पर ट्रक निष्क्रिय रहने और अर्थव्यवस्था को नुकसान के तौर पर सामने है.

राज्यों से ड्राइविंग के पेशे को ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए कौशल विकास, कॉमर्शियल लिटरेसी, राजमार्गों पर बेहतर सुविधाएं देने, राज्य स्तर पर विशिष्ट योजनाएं शुरू करने और स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने जैसे उपाय करने को कहा गया है.

सभी राज्यों को सलाह दी गई है कि वे अपनी लॉजिस्टिक पॉलिसी बनाएं, केंद्रीय एजेंसियों और स्थानीय हितधारकों के क्षेत्रीय अधिकारियों के प्रतिनिधित्व के साथ राज्य स्तर के साथ-साथ शहर स्तर पर भी लॉजिस्टिक कोऑर्डिनेशन कमेटी गठित करें और समन्वय के लिए एक लॉजिस्टिक सेल हो जो कारोबार के लिए आवश्यक अनुमतियां हासिल करने में मदद करे.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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