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छोटी इकाइयां बंद, चौकीदार बनना पसंद कर रहे हैं बुनकर: कोविड ने कैसे कर्नाटक के गारमेंट इंडस्ट्री को बर्बाद किया

बेंगलुरू: मंगलवार सुबह के 9.30 बजे हैं, और बेंगलुरू के भुवनेश्वरी नगर में कभी दूसरी पीढ़ी के हथकरघा बुनकर रहे एस. मरुदाचला मूर्ति ने स्कूल की फीस के बारे में चर्चा करने के लिए छात्रों के अभिभावकों की एक बैठक बुलाई है.

एक आध्यात्मिक ट्रस्ट द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्था में पढ़ने वाली उनकी सबसे बड़ी बेटी की वार्षिक फीस 70,000 रुपये है. यह बैठक स्कूल प्रशासन से उनकी 50 प्रतिशत फीस माफ करने का अनुरोध करने पर आम सहमति बनाने के लिए बुलाई गई है, क्योंकि इस महामारी, उसके बाद के लॉकडाउन और अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले इसके प्रतिकूल प्रभाव के कारण छात्रों के अभिभावकों, जिनमें से से कुछ बुनकर हैं, की आय अब तक के सबसे न्यूनतम स्तर पर है.

मूर्ति ने द प्रिंट को बताया, ’हथकरघा उद्योग से होने वाली आय पिछले साल पूरी तरह से बंद हो गई थी. आज के दिन में स्थिति लगभग 50 प्रतिशत तक सुधरी है, लेकिन इस उद्योग को सामान्य स्थिति में लौटने में अभी एक या दो साल और लगेंगे, बशर्ते आगे कोई और लॉकडाउन नहीं होता है.’

हथकरघा बुनाई, कपड़ा क्षेत्र के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के सबसे छोटे घटकों में से एक है और यह मूर्ति जैसे परिवारों द्वारा संचालित एक पारंपरिक शिल्प है.

कोविड महामारी और उसके बाद लॉकडाउन के कारण इस सूक्ष्म-व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ था. इसने उपभोक्ता मांग को काफी कम कर दिया, जिससे गारमेंट उद्योग पूरी तरह से चरमरा गया था.

हथकरघा मालिकों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि करघे पर काम करने वाले मजदुर अपने-अपने गृहनगर चले गए थे और वापस लौटे ही नहीं. अब करघे बेकार पड़े हैं, जबकि कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है.

कर्नाटक की 2019-2024 की नई कपड़ा नीति के आंकड़ों के अनुसार, यह राज्य देश के कुल परिधान उत्पादन में 20 प्रतिशत का हिस्सा रखता है, जिसका अनुमानित मूल्य करीब 1.56 बिलियन डॉलर है.

लेकिन राज्य की गारमेंट फैक्ट्रियों को महामारी की समस्या के कारण बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ी है. बेंगलुरू स्थित अल्टरनेटिव लॉ फोरम (ए.एल.एफ.) के एक अध्ययन के अनुसार, मुश्किल से 500 से 1,000 कर्मचारियों के साथ काम करने वाली कई छोटी इकाइयां वित्तीय घाटे को सहन करने में असमर्थ होने के कारण बंद हो गई हैं. इसका असर ऊपर से नीचे तक, कपड़ा व्यापारियों से लेकर करघा मालिकों और बुनकरों तक, पूरी आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है. हालांकि, मांग के सामान्य होने के साथ ही, बड़े परिधान कारखानों ने चौबीसों घंटे काम करना शुरू कर दिया है.

हथकरघा उद्योग मुश्किल में

दशहरा और दिवाली तक चलने वाला यह मौसम आम तौर बुनकरों के लिए सबसे व्यस्त समय माना जाता है, लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है.

मूर्ति का ही मामला लें. बमुश्किल कुछ साल पहले ही मूर्ति और उनके 75 वर्षीय पिता सी.पी. सुब्रमणि के पास 16 हथकरघा थे और उनपर 14 कर्मचारी काम करते थे. आज उनके आवास के बगल में बने एक हॉल में सिर्फ चार हथकरघा हैं, जिनमें से भी केवल दो ही काम कर रहे हैं. मूर्ति अब बुनाई का काम नहीं करते. उनके वयोवृद्ध पिता और एक अन्य करघा कामगार अब एक ऐसे व्यवसाय की जिम्मेदारी संभल रहे हैं जो कर्नाटक में तेजी से अपना आधार खो रहा है.

मूर्ति कहते हैं,‘अब कोई भी इस काम को करने वाला वाला नहीं है. बुनकर इसके बजाय ड्राइवर, सेल्सपर्सन, सिक्योरिटी गार्ड के रूप में नौकरी करना पसंद करते हैं क्योंकि वहां उन्हें कम-से-कम 10,000 रुपये से 12,000 रुपये का निश्चित वेतन तो मिलता है.’

उन्होंने बताया कि सैकड़ों करघा मजदूर लॉकडाउन के दौरान अपने-अपने गृहनगर वापस चले गए और फिर कभी नहीं लौटे. कुछ ने अन्य नौकरियों को अपना लिया है या फिर इसके सहायक विनिर्माण के साथ टिके रहने का प्रयास कर रहे हैं.

सत्तर वर्षीय कुलप्पा, जो पिछले 45 वर्षों से एक हथकरघा कामगार हैं, उन कुछ लोगों में से एक हैं, जो इस महामारी के दौरान भी इस व्यापार जुड़े रहे हैं, लेकिन उनकी आय भी काफी मामूली है. वह अपने द्वारा बुनी जाने वाली प्रत्येक साड़ी पर 700 रुपये कमाते हैं और इस तरह एक दिन में लगभग 350 रुपये कमा पाते हैं, क्योंकि ‘एक साधारण साड़ी को बुनने में लगभग दो दिन लगते हैं’. कुलप्पा बताते हैं कि अगर वह कर्नाटक के किसी दुकान के लिए साड़ी बुन रहे हैं तो उनकी मजदूरी 100 रुपये और कम हो जाती है.

एक और जहां कुलप्पा अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाते हए 8,000 रेशम के धागों की निगरानी के साथ (एक बार में एक साड़ी में 2,000 तरह के धागे बुने जाते हैं), पिट करघे पर अपने पैरों के साथ पैडल चला रहे हैं, वहीँ साथ में तीन और करघे बेकार पड़े हैं.

गुनाशेखर, जिनका परिवार पूरी तरह से हथकरघा से जुड़ा हुआ है, के लिए यह महामारी एक नया बदलाव लायी है. उन्होंने अपनी हथकरघा इकाई को बंद कर दिया और अपने संसाधनों को एक मोटरयुक्त रेशम स्पूलिंग इकाई को स्थापित करने में लगा दिया. उनके अनुसार इस कदम से उनके कारोबार में 10,000 रुपये की वृद्धि हुई है.

हालांकि, हर कोई इस तरह का बदलाव करने में सक्षम नहीं हो पाया है.

कर्नाटक आर्थिक सर्वेक्षण 2020-2021 के अनुसार, राज्य में कुल 33,677 बुनकर परिवार हैं. यहां 33,539 हथकरघा उपकरण भी हैं, जिनमें से 4,162 बेकार पड़े हैं. इस सर्वेक्षण के अनुसार, शेष 29,377 हथकरघा 50,574 बुनकरों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं.

महामारी के दौरान, उनमें से सैकड़ों बुनकरों ने अपने व्यवसाय को त्यागने का विकल्प चुना. उनकी मदद के लिए राज्य सरकार के प्रयासों से भी उन्हें कोई सहायता नहीं मिली है.

पिछले साल (2020 में) कर्नाटक सरकार ने एक योजना – नेकारा सम्मान योजना – की घोषणा थी जिसके तहत राज्य में प्रत्येक पंजीकृत बुनकर को 2,000 रुपये की नकद सहायता प्रदान की जानी थी.

कई राज्यों में पारंपरिक व्यावसायिक समूहों के साथ काम करने वाले संगठन श्रेनी समुदाय के संस्थापक सुधीर कामत का कहना है, ‘इस योजना ने उन करघा कामगारों की कोई मदद नहीं की है जो न तो असंगठित क्षेत्र के मजदूरों में शामिल हो पाते हैं और न ही वे स्वयं करघा के मालिक हैं.’

कामत ने कहा कि यह सहायता योजना केवल सरकार के साथ पंजीकृत लोगों (बुनकरों) के लिए थी. मगर,उनके अनुसार, लालफीताशाही और पंजीकरण संख्या जारी करने सम्बन्धी मानदंडों के स्पष्ट वर्गीकरण के आभाव में कई करघा कारगार सरकार के साथ पंजीकृत नहीं हो पाते हैं.

वे आगे बताते हैं,’इस क्षेत्र में छाया संकट कोविड से पहले का है. लेकिन महामारी ने इस हालत को और बदतर बना दिया है. लॉकडाउन ने करघा मालिकों के पास साड़ियों का ऐसा विशाल भंडार छोड़ दिया है जिसका उन्हें कोई पारिश्रमिक मूल्य नहीं मिलेगा. इसका मतलब है कि उनकी मज़बूरी वाली बिक्री होगी. इस वजह से करघा मालिक गहरे कर्ज में डूब गए हैं.’

कामत का कहना है ‘दुर्भाग्य से, पारंपरिक करघा कामगारों, जिन्हें मैं स्वदेशी कामगार कहता हूं, का न तो मांग पर नियंत्रण है और न ही आपूर्ति पर. वे खरीददारों द्वारा दिए गए आदेशों के आधार पर काम करते हैं. सबसे चिंताजनक बात यह है कि उनके पास बाजार तक सीधी पहुंच नहीं है और कच्चे माल की खरीद के लिए नियमित क्रेडिट लिंक की कोई व्यवस्था भी नहीं है.‘


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बड़ी कंपनियों की हालत में सुधार, छोटी इकाइयों के लिए बहुत कम उम्मीद

कर्नाटक आर्थिक सर्वेक्षण 2020-2021 के अनुसार, राज्य का रेडीमेड वस्त्र क्षेत्र 4,41,738 लोगों को रोजगार देता है. 2019-2020 के वित्तीय वर्ष के दौरान रेडीमेड कपड़ों के रूप में कर्नाटक का कुल निर्यात 15,707.11 करोड़ रुपये रहा, जो 2018-2019 के आंकड़े से लगभग 200 करोड़ रुपये कम है.

गारमेंट्स एंड टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन (गैटवू) और ए.एल.एफ़ द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान कपड़ा कारखानों को भारी नुकसान हुआ, जिसका असर अंततः कर्मचारियों पर भी पड़ा.

इस अध्ययन में शामिल किये गए बेंगलुरु के तीन परिधान समूहों (क्लस्टर्स) में स्थित 25 कारखानों में से नौ कारखाने इस महामारी के दौरान पूरी तरह से बंद हो गए थे, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 5,600 से 7,200 श्रमिकों ने अपनी नौकरी खो दी थी. अध्ययन के अनुसार इस सर्वेक्षण में पाया गया कि बाकि सोलह फैक्ट्रियों ने भी अपने आकार को कम किया था, जिससे 11,000 और श्रमिकों की नौकरी चली गई थी.

गैटवू की अध्यक्ष प्रतिभा आर. ने दिप्रिंट को बताया, ‘हमने अनुमान लगाया कि 60 प्रतिशत परिधान श्रमिकों को बिना सूचना के और दबाव में आते हुए अपनी नौकरी खोनी पड़ी. उन्हें इस्तीफा देने और अपना बकाया हासिल करने अथवा अपने बकाया को भूल जाने के लिए कहा गया था.’

उन्होंने यह भी बताया कि कारखानों और बॉयलर विभाग के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि बेंगलुरु शहरी जिले में 1 अप्रैल, 2020 के बाद से 65 कारखानों को बंद के रूप में दर्ज किया गया है

वे कहती हैं, ‘कारखाने बंद होने के कारण अपनी नौकरी गंवाने वाले हजारों अन्य कामगार उन इकाइयों में काम करते थे जिनमें 100 से कम कर्मचारी थे.’

प्रतिभा ने कहा कि नवंबर 2020 में ऑर्डर वापस आने के बाद से चीजें सुधरने लगीं, लेकिन यह पुनरुद्धार केवल बड़े परिधान कारखानों तक ही सीमित है.

गैटवू के कानूनी सलाहकार जयराम केआर ने कहा, ‘अब बहुत सारा काम है लेकिन कामगारों की कमी है क्योंकि कई लोग अपने गृहनगर वापस चले गए हैं और वहां से लौटने को तैयार नहीं हैं. बड़े कारखाने चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं और सप्ताहांत पर भी कामगारों को अतिरिक्त भुगतान करने को तैयार हैं. चूंकि कामगारों को पैसे की सख्त जरूरत है, इसलिए वे ऐसी नौकरी कर भी रहे हैं.’

उन्होंने बताया कि ज़्यदातर व्यवसाय और दुकानें बंद होने के कारण एक साल से रखे हुए स्टॉक को वापस कारखानों में भेज दिया गया है.

जयराम ने बताते हैं, ‘अब ‘बैक टू वेयरहाउस’ नामक एक नयी अवधारणा सामने आई है जिसमें एक वर्ष के भीतर बिक्री नहीं होने वाले कपड़ों को कारखानों में वापस कर दिया जाता हैं. चूंकि विदेशी ब्रांडों के एक्सक्लूसिव रिटेल आउटलेट (विशिष्ट खुदरा दुकान) में कारोबार हो ही नहीं रहा था, इसलिए स्टॉक वापस भेज दिया गया है.’

वे बताते हैं, ‘गारमेंट फैक्ट्रियां अब उन्हें नॉन-ब्रांडेड स्टोरों में बेच रही हैं जहां उन्हें काफी सस्ते दामों पर बेचा जा रहा है. मैं कभी भी एरो ब्रांड की शर्ट नहीं खरीद सकता था क्योंकि इसकी कीमत लगभग 3,000-4,000 रुपये होती थी, लेकिन मैंने हाल ही में 350 रुपये के भाव से तीन एरो शर्ट खरीदीं हैं.’

छोटे और मझोले कारोबारियों, व्यापारियों को पड़ रही है दोहरी मार

एशिया के सबसे बड़े कपड़ा बाजारों में से एक चिकपेट में अपनी दुकान में बैठे सज्जन राज मेहता ने दिप्रिंट को बताया कि उनके क्षेत्र में अब तक सिर्फ 60 प्रतिशत का सुधार आया है.

वे कहते हैं, ‘हमारा एक फैशन और उपयोगिता-आधारित व्यवसाय है. स्कूलों, कार्यालयों, कॉलेजों, यात्राओं, पार्टियों, समारोहों, सामाजिक कार्यक्रमों आदि के पूरी तरह से बंद होने के कारण कोई मांग ही नहीं है. लोगों की आय कम हो गई है और उनके पास जो भी पैसा है, उसे वे चिकित्सा खर्च और जरुरी घरेलू खर्च के लिए बचाना चाहते हैं. पिछले चार महीनों में ही कुछ मांग वापस आई है.’

मेहता, जो कर्नाटक होजरी एंड गारमेंट एसोसिएशन (खागा) की कराधान (टैक्सेशन) समिति के अध्यक्ष हैं, ने दिप्रिंट को बताया कि 45वीं गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स परिषद के एक नए प्रस्ताव के कारण परिधान क्षेत्र को और भी झटकों का सामना करना पड़ेगा.

इस प्रस्ताव का उद्देश्य वर्तमान में मौजूद इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर को ठीक करना और अगले साल जनवरी से सभी परिधानों को 12 प्रतिशत के स्लैब में लाना है.

वर्तमान में टेक्सटाइल क्षेत्र के नियमों में सादे कपडे (फैब्रिक) के लिए जीएसटी की दर पांच प्रतिशत है. मानव निर्मित फाइबर (रेशे) के लिए यह 18 प्रतिशत और मानव निर्मित यार्न (धागे) के लिए नियत दर 12 प्रतिशत है. 1000 रुपये से कम कीमत वाले परिधानों (गारमेंट्स) पर 5 फीसदी जीएसटी लगता है जबकि 1000 रुपये से ऊपर के गारमेंट्स पर 12 फीसदी जीएसटी लगता है.

अब सरकार सभी कपड़ों को 12 फीसदी वाले स्लैब में लाने पर विचार कर रही है, चाहे उनकी कीमत कुछ भी हो.

वर्तमान में लागू इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर के तहत सरकार को अनिवार्य रूप से रिवर्स इनपुट टैक्स क्रेडिट वापस कारण पड़ता है जो तब जमा हो जाती है जब अंतिम उत्पाद पर लगाया गया कर इसके लागत के सामानों (इनपुट) पर लगाए गए करों से कम होता है.

उदाहरण के लिए, 1000 रुपये से कम कीमत के तैयार चमड़े के जूते पर वर्तमान जीएसटी स्लैब 5 प्रतिशत है. लेकिन जूते के निर्माण में काम आने वाले इनपुट के लिए जीएसटी स्लैब 18 प्रतिशत तक है. इस वजह से सरकार फुटवियर सेक्टर को सालाना करीब 2,000 करोड़ रुपये वापस करती है

मेहता कहते हैं, ‘यह आत्मघाती कदम होगा. अकेले इस इलाके में ही दर्जनों कपड़ा व्यापारियों ने लॉकडाउन के दौरान हुए नुकसान को सहन करने में असमर्थ होने की वजह से अपनी दुकानें बंद कर दी हैं. अगर जीएसटी परिषद रेडीमेड गारमेंट्स और टेक्सटाइल के तहत सभी वस्तुओं, चाहे उनका विक्रय मूल्य कुछ भी हो, पर 12 प्रतिशत के स्लैब के तहत कर लगाने का फैसला करती है, तो हम तो खत्म ही हो जाएंगे.‘

इसके अलावा, कपास की बढ़ती कीमतों और ईंधन की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से बढ़ी परिवहन लागत ने कई कपड़ा व्यापारियों के लिए अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है, कयोंकि वे पहले से ही मांग में आई गिरावट और घाटे की समस्या से जूझ रहे हैं.

ऐसे ही एक कपड़ा व्यापारी गौतम चंद पोरवाल को अपना कारोबार छोटा करना पड़ा. पोरवाल ने कहा, ‘मैं पूरे दक्षिण भारत में बच्चों के कपड़ों की आपूर्ति करता था, लेकिन पहले यह केवल कर्नाटक तक सीमित हो गया और अब तो मैं केवल बेंगलुरु में हीं आपूर्ति कर सकता हूं. इनपुट कॉस्ट (लागत मूल्य) में 20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. लॉकडाउन के बाद से कारोबार में 60 फीसदी की गिरावट आई है. मैं तो बस धैर्य हीं रख सकता हूं.’

कुछ अन्य लोगों ने अपने व्यवसायों को नया स्वरूप देकर इन्हें बचाए रखने में कामयाबी हासिल की है.

खागा के अध्यक्ष डूंगरमल चोपड़ा ऐसे ही एक उद्यमी हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं एक परिधान निर्माण इकाई चलाता हूं, जहां स्कूल के यूनिफार्म की सिलाई होती है और मैं उनकी आपूर्ति भी करता हूं. लेकिन महामारी के दौरान, यह काम एकदम से ठप हो गया. खुद को बचाने के लिए मुझे अपनी फैक्ट्री को मास्क बनाने वाली इकाई में बदलना पड़ा, इससे कोई खास मुनाफा तो नहीं हुआ लेकिन इसने मुझे अपना कारोबार बंद करने से बचा लिया.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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