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पुलिस द्वारा सूचना देने की ‘अनिच्छा’ से दंगा क्षेत्रों में राहत कार्य पर हुआ असरः अल्पसंख्यक पैनल

नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने फरवरी 2020 के दंगों के बारे में कुछ विवरण उपलब्ध कराने में दिल्ली पुलिस से सहयोग की कमी पर चिंता व्यक्त की है, जिसमें कहा गया है कि पीड़ितों के बीच मुआवजे के वितरण में ‘बाधा’ आई है.

अल्पसंख्यक कल्याण समिति के प्रमुख अमानतुल्लाह खान द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में इस तथ्य को उजागर किया गया और इसे गुरुवार को दिल्ली विधानसभा में पेश किया गया.

23 फरवरी से 27 फरवरी 2020 के बीच हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों पर अल्पसंख्यक पैनल द्वारा तैयार की गई यह पहली रिपोर्ट है, जिसमें कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी और 581 घायल हो गए थे.

दिल्ली पुलिस पर आरोप लगाते हुए, 13 पृष्ठों की इस रिपोर्ट में, जिसकी एक प्रति दिप्रिंट द्वारा एक्सेस की गई थी, में समिति बैठकों के दौरान जीएनसीटीडी के गृह विभाग (दिल्ली सरकार) द्वारा पूर्ण समर्थन प्रदान करने के लिए उसकी सराहना की गई है. हालांकि, यह भी कहा गया है कि पीड़ितों के लिए त्वरित राहत सुनिश्चित करने का समिति का उद्देश्य दिल्ली पुलिस के पूर्ण सहयोग पर निर्भर था, जो कि नहीं किया गया.

इसमें कहा गया है, ‘सूचना साझा करने में दिल्ली पुलिस की अनिच्छा ने समिति के कामकाज को गंभीर रूप से बाधित किया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि समिति को उम्मीद थी कि भविष्य में स्थिति में सुधार होगा . खान ने रिपोर्ट में कहा कि अभी भी कई पीड़ित हैं जो मुआवजा पाने के लिए इधर-उधर का चक्कर लगा रहे हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘दंगों के एक साल बाद से क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के किसी भी हकदार को इसके लिए संघर्ष नहीं करना चाहिए था.’ यहां तक कि कोविड-19 के कारण जारी लॉकडाउन के बावजूद भी.


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पैनल ने पुनर्मूल्यांकन के लिए दिया नई टीम का सुझाव

समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि कई मामलों में ऐसा प्रकाश में आया है कि दंगा प्रभावित क्षेत्रों में सर्वेक्षण करने वाले अधिकारियों द्वारा मुआवजा राशि पर फैसला करने के लिए जो रिमार्क दिए गए वे पैनल के सदस्यों द्वारा दिए गए सबूतों से मेल नहीं खाते हैं.

उन्होंने कहा, ‘समिति का मानना है कि पहले गई वेरिफिकेशन टीम के स्तर पर लापरवाही हो सकती है या यह निर्णय लेने के संदर्भ में एक सामान्य त्रुटि हो सकती है.’

विधानसभा में पेश रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे सरकार की इस तरह के मुद्दे को संभालने की क्षमता के बारे में लोगों के बीच ‘अधिक अविश्वास’ पैदा हो सकता है.

पुनर्मूल्यांकन का उचित मौका दिए जाने की बात कहते हुए खान ने रिपोर्ट के समापन में कहा कि ऐसे मामलों का फिज़िकल वेरिफिकेशन करने के लिए डिवीजनल कमिश्नर, दिल्ली वक्फ बोर्ड और प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों के विधायकों के कार्यालय के प्रतिनिधियों की एक नई टीम बनाई जाए.

उन्होंने यह भी सिफारिश की कि मुआवजा फॉर्म भरने की प्रक्रिया केवल उन लोगों के लिए फिर से शुरू की जाए जो पिछले साल आवेदन नहीं कर सके थे. ‘ऊर्जा और समय को बचाने और प्रविष्टियों के दोहराव से बचने के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाए जाने की ज़रूरत है.

विधानसभा में रिपोर्ट प्रस्तुत करने से एक माह के भीतर डिवीज़नल कमिश्नर को कार्रवाई रिपोर्ट (एटीआर) प्रस्तुत करने के निर्देश दिया गया है.

दिप्रिंट ने पिछले महीने एक रिपोर्ट में बताया था कि कैसे पीड़ितों को मुआवजा देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए आयोग को अभी तक प्राप्त हुए किसी भी मामले पर कुछ भी नहीं कहा है.

पैनल ने रिपोर्ट में कहा कि कुछ मामलों में मुआवजे के कुछ दावों को खारिज कर दिया गया क्योंकि एसेसमेंट टीम नुकसान की घटना का पता नहीं लगा पाई, खासकर लूट और बर्बरता के मामलों में. दिल्ली वक्फ बोर्ड को पुनर्मूल्यांकन के लिए पीड़ितों से ऐसे 218 मामलों की सूची मिली थी.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अनुचित पुनर्मूल्यांकन की शिकायतें मिलने के बाद कैसे मुस्तफाबाद के विधायक हाजी यूनुस को कुछ प्रभावित क्षेत्रों में स्वयं जाकर दौरा करने के लिए अनुरोध करना पड़ा. पैनल ने कहा कि उसे जानकारी मिली कि कुल 218 मामले जिनका पुनर्मूल्यांकन नहीं किया गया था, लेकिन यह वेरिफिकेशन टीम द्वारा पैनल के सदस्यों को भेजे गए पहले के रिमार्क का ही पुर्नप्रस्तुतीकरण था.

यूनुस ने समिति को दस्तावेज में दर्ज फोटो और वीडियो के साथ ऐसे मामलों की सूची पेश की, जिसे समिति ने फिर से डिवीज़नल कमिश्नर को भेज दिया.

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


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