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सिकुड़ते बजट के कारण भारतीय परिवारों को लेना पड़ रहा है उधार, वैक्सीनेशन में तेजी से ही उनकी हालत सुधर सकती है

कोविड महामारी की दूसरी लहर और इसके चलते लगाए गए लॉकडाउन ने पारिवारिक आमदनी को गहरी चोट पहुंचाई है. परिवारों ने उधार ले-लेकर अपना काम चलाया है. भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़े परिवारों द्वारा सोना गिरवी रखकर उधार लेने के मामलों में बड़ी वृद्धि बताते हैं. औपचारिक सेक्टर के अलावा अनौपचारिक सेक्टर से भी उधार लिये ही गए होंगे लेकिन उनके आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं.

कर्ज के बारे में रिजर्व बैंक के आंकड़े पर्सनल लोन में भारी वृद्धि दर्शाते हैं. अप्रैल में पर्सनल लोन में 12.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई. इसमें दहाई अंकों वाली वृद्धि वाहन के लिए लिये गए कर्ज में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि, क्रेडिट कार्ड के जरिए लिये गए कर्ज में 17 प्रतिशत की और सोने के जेवरों को गिरवी रखकर लिये गए कर्ज में 86 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि के चलते हुई.

मार्च तक बैंकों ने जेवरों के ऊपर जो कर्ज दिया उसमें 82 प्रतिशत की वृद्धि हुई और वह 60,464 करोड़ रुपये पर पहुंच गया. इसके अगले महीने अप्रैल में यह आंकड़ा 62,238 करोड़ रु. पर पहुंच गया. इससे एक साल पहले इस तरह 33,303 करोड़ रु. के कर्ज दिए गए थे.

भारतीय परिवारों के बैलेंसशीट में भौतिक संपत्तियों की प्रमुखता है, जिनमें सोना का हिस्सा सबसे ज्यादा है.


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महामारी का प्रकोप

महामारी के कारण आए आर्थिक संकट ने ज्यादा से ज्यादा परिवारों को कर्ज में डुबो दिया है. अभी केवल पहली लहर के लिए आंकड़े उपलब्ध हैं. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि परिवारों का कर्ज जुलाई-सितंबर 2020-21 की तिमाही में जीडीपी के 37.1 प्रतिशत के बराबर था, जबकि इसी वित्तीय वर्ष की इस्से पिछली तिमाही में यह 35.4 के बराबर था. दूसरी लहर में परिवारों से संबंधित ये आंकड़े कुछ तिमाही बाद उपलब्ध होंगे.

परिवार के कर्ज का अनुमान बैंकों, हाउसिंग फाइनांस कंपनी, गैर-बैंकिंग फाइनांस कंपनियों के लिए उसकी देनदारियों का जीडीपी में जो अनुपात है उससे लगाया जाता है. मासिक उधार के आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में कर्ज में बड़ी वृद्धि दिख सकती है. पर्सनल लोन के आंकड़े बताते हैं कि दूसरी लहर के दौरान परिवार कंज़्यूमर ड्यूरेबल पर उस तरह खर्च नहीं कर रहे हैं जिस तरह पहली लहर के दौरान कर रहे थे.

उदाहरण के लिए, अप्रैल में कंज़्यूमर ड्यूरेबल के लिए लिये जाने वाले पर्सनल लोन में 18 प्रतिशत की कमी आई. चालू आंकड़े पिछले साल इसी अवधि (अप्रैल 2020) के, जब कंज़्यूमर ड्यूरेबल के लिए कर्ज में करीब 44 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, इन आंकड़ों से बिलकुल उलट हैं.

यह बताता है कि परिवारों ने आय में कमी के बीच जबरन कर्ज लिया. कई परिवारों ने जरूरी जरूरतों को पूरा करने के लिए सोना गिरवी रखकर कर्ज लिया. यह महामारी से पहली की स्थिति से उलट है, जब कर्ज अपने रहनसहन को सुधारने के लिए कंज़्यूमर ड्यूरेबल खरीदने के वास्ते लिया जाता था.


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एमएसएमई भी दबाव में

व्यक्तियों और परिवारों के अलावा लघु उद्योग सेक्टर द्वारा लिये जाने वाले कर्ज में भी वृद्धि हो गई. लॉकडाउन के कारण मांग में कमी आई, फिर भी हम पाते हैं कि लघु एवं मझोले उद्योगों को कर्ज में बढ़ोतरी हुई.

कुल नॉन-फूड बैंक क्रेडिट में तो मामूली 5.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, मझोले उद्योग को कर्ज में 43.8 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि हुई जबकि एक साल पहले इसमें 6.4 प्रतिशत की कमी आई थी. मझोले उद्योगों को कर्ज में सितंबर 2020 के बाद से दहाई अंकों में वृद्धि हुई है. इसकी बड़ी वजह यह हो सकती है कि महामारी के दौरान सरकार ने लघु उद्योगों को ही सहायता दी.

महामारी के कारण पड़े दबाव को दूर करने के लिए सरकार ने 3 लाख करोड़ की ‘इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) की घोषणा की. इसका मकसद कार्यशील पूंजी उपलब्ध करना, संचालन संबंधी देनदारी पूरी करने और महामारी से प्रभावित कारोबार को शुरू करने में मदद करना है. इस स्कीम में एमएसएमई को पूरी तरह गारंटीशुदा कर्ज दिया जाता है. स्कीम का लक्ष्य बैंकों को प्रोत्साहन देना था कि वे महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित एमएसएमई के कर्जदारों को फंड दे सकें.

फरवरी के अंत तक, बैंकों ने एमएसएमई के 87 लाख कर्जदारों को 2.46 लाख करोड़ रु. कर्ज दे चुका थे. सरकार ने हाल में ईसीएलजीएस स्कीम के तहत उधर लेनी की शर्तों को आसान किया. रिजर्व बैंक ने एमएसएमई के लिए लोन के ढांचे में बदलाव के अलावा जो दूसरे उपाय किए हैं उनसे एमएसएमई को कर्ज में और वृद्धि हो सकती है.

अब जबकि कोविड की दूसरी लहर खत्म होने लगी है और लॉकडाउन में छूट दी जा रही है, परिवारों और छोटी कंपनियों को ज्यादा कमाई करने औए अपना बैलेंस शीट सुधारने का मौका मिलेगा. धीरे-धीरे, सावधानी के साथ छूट देना और लोगों का टीकाकरण करना ही उपाय है. परिवारों और फ़र्मों के बजट ईस तरह सिकुड़ गए हैं कि अब वे और लॉकडाउन बर्दाश्त नहीं कर सकतीं. उनकी भलाई लोगों के टीकाकरण की गति पर निर्भर है.

(इला पटनायक एक अर्थशास्त्री और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर हैं. राधिका पांडे एनआईपीएफपी में सलाहकार हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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