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मामले घटने पर लोग कोविड को भूल गए, वायरस की वापसी को लेकर हम तैयार नहीं थे: UP के स्वास्थ्य मंत्री

लखनऊ: स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह का कहना है कि कुंभ तीर्थयात्री नहीं बल्कि ये महाराष्ट्र, पंजाब और दिल्ली जैसे राज्यों से घर लौटने वाले प्रवासी मजदूर हैं जो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा संक्रमण और कोविड-19 का घातक म्यूटेंट लेकर आए.

जय प्रताप सिंह ने बुधवार को एक टेलीफोनिक इंटरव्यू में दिप्रिंट को बताया, ‘यूपी के लोग, जो दूसरे राज्यों में काम करते हैं, आम तौर पर हर साल (मार्च के आसपास) होली मनाने के लिए या फिर फसल कटाई के लिए लौटते हैं. यही समय था जब हमारे लिए समस्या शुरू हुई. सबसे ज्यादा संक्रमण से प्रभावित महाराष्ट्र, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग यूपी लौटने लगे. और कोविड-19 मामलों की संख्या अचानक 100 गुना तक बढ़ गई. हम इसके लिए तैयार नहीं थे.’

जय प्रताप सिंह ने कहा कि यूपी ने पिछली बार कोविड का पीक 17 सितंबर 2020 को छुआ था, जब राज्य में एक्टिव केस की कुल संख्या बढ़कर 68,000 तक पहुंच गई थी. स्वास्थ्य मंत्री ने कहा, ‘उसके बाद हमारे यहां संख्या घटने लगी. बाकी जगहों की तरह यहां भी लोग कोविड के बारे में भूल गए. और तभी म्यूटेंट वायरस ने फिर से हम पर हमला बोल दिया. देखते-देखते आंकड़े नियंत्रण से बाहर हो गए.’

मार्च मध्य से लेकर अब तक करीब एक महीने की अवधि में ही उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र के बाद देश का दूसरा सबसे अधिक प्रभावित राज्य बन गया है— राज्य में बुधवार को नए कोविड मामलों की आधिकारिक संख्या 33,106 थी जो महाराष्ट्र में 67,468 केस के बाद दूसरे नंबर पर थी. पिछले 24 घंटों में यहां आधिकारिक तौर पर कोविड की वजह से 187 मौतें हुई हैं.

स्वास्थ्य मंत्री ने स्वीकार किया कि संकट से निपटने के लिए राज्य का मौजूदा बुनियादी ढांचा पर्याप्त नहीं था. उन्होंने कहा कि हालात इस वजह से और भी ज्यादा बिगड़ गए क्योंकि बड़ी संख्या में डॉक्टरों के संक्रमित होने के कारण हेल्थ मैनपॉवर की कमी हो गई है.

राज्य ने अपना चिकित्सा बुनियादी ढांचा सुधारना शुरू कर दिया है— अस्पतालों में और बेड का इंतजाम किया जा रहा है और मरीजों के लिए दवाओं और ऑक्सीजन का स्टॉक बढ़ाया जा रहा है. यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि बिना लक्षण वाले मरीजों को अस्पतालों से छुट्टी दे दी जाए और उन्हें घर में क्वारेंटाइन रखकर इलाज किया जाए ताकि ज्यादा जरूरतमंद लोगों को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सके. फिर भी संकट जस का तस बना हुआ है.


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चिकित्सा सुविधाओं का अभाव

देश के बाकी हिस्सों की तरह राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कोविड के इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों की संख्या अस्पताल में उपलब्ध बेड से बहुत ज्यादा है, यहां तक कि कई बड़े कोविड अस्पतालों की भी यही स्थिति है.

जय प्रताप सिंह ने कहा कि उदाहरण के तौर पर लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में 4,500 बेड हैं. राज्य की राजधानी में ही स्थित संजय गांधी स्नातकोत्तर मेडिकल कॉलेज और राम मनोहर लोहिया अस्पताल में से प्रत्येक में 200 बेड हैं. साथ ही जोड़ा, लेकिन इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या अस्पताल में उपलब्ध बेड की संख्या से लगभग दस गुना हैं.

उन्होंने कहा, ‘लोग न केवल लखनऊ बल्कि पूर्वी यूपी और आसपास के अन्य शहरों से यहां आ रहे हैं. ऐसे में बेड और अन्य आवश्यक चीजों की कमी होना तय है. कानपुर, प्रयागराज, गोरखपुर और वाराणसी में भी स्थिति ऐसी ही है. ये शहर वो हैं जहां कोविड मरीजों की संख्या सबसे ज्यादा है.’


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डॉक्टर भी कोविड की चपेट में आ रहे

राज्य के सामने चुनौती सिर्फ बेड, मेडिकल ऑक्सीजन और दवाओं की आपूर्ति की कमी की नहीं है बल्कि मरीजों की देखभाल के लिए आवश्यक मेडिकल मैनपॉवर भी कम है.

मंत्री ने कहा, ‘वायरस के बेहद संक्रामक होने के कारण हम डॉक्टरों की कमी का भी सामना कर रहे हैं. केजीएमयू में कुल डॉक्टरों में से करीब एक तिहाई संक्रमित हो चुके हैं. बाकी बचे डॉक्टर ओवरटाइम काम कर रहे हैं…यही स्थिति हर जगह है. यह हम सभी के लिए एक चुनौतीपूर्ण समय है.’

स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि अस्पतालों पर दबाव घटाने के लिए यूपी सरकार अब कोविड मरीजों के डिस्चार्ज के लिए एक नई नीति लेकर आई है.

जय प्रताप सिंह ने स्पष्ट किया, ‘अस्पताल में भर्ती किसी व्यक्ति में अगर पांच से सात दिनों तक कोई लक्षण नहीं दिखे तो उन्हें बताया जाएगा कि वे घर जाएं, आइसोलेशन में रहें और अपनी दवाएं लेना जारी रखें. डॉक्टर उनकी हालत पर नज़र रखे रहेंगे. इससे किसी ज्यादा जरूरतमंद मरीज को अस्पताल में बेड मिल पाएगा.’


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बुनियादी ढांचा मजबूत कर रहे

इसके साथ ही, स्वास्थ्य मंत्री ने यह भी बताया कि राज्य सरकार ने अपने स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना शुरू कर दिया है, जिसके तहत बेड की संख्या और ऑक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाई जा रही है.

उनके मुताबिक, मध्य अप्रैल तक राज्य में मेडिकल ऑक्सीजन की खपत 30-35 प्रतिशत बढ़ चुकी है और केंद्र ने इसकी आपूर्ति बढ़ाने के इसके अनुरोध को मंजूर कर लिया है.

उन्होंने कहा, ‘ऑक्सीजन की कमी का सामना करने के बाद हमने अपना आवंटन बढ़ाने के लिए केंद्र को लिखा था. इसे हफ्ते के शुरू में 200 मीट्रिक टन की पूर्व सीमा से बढ़ाकर 751 मीट्रिक टन कर दिया गया है. हम मेडिकल ऑक्सीजन लाने के लिए राज्य के लिए तय किए गए प्लांट, जैसे एक बोकारो में और मथुरा स्थित मोदी नगर प्लांट से रीफिल कराने के लिए अपने टैंकर भेज रहे हैं’

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इस समय हर कोई एक अनजान दुश्मन से लड़ रहा है. उन्होंने कहा, ‘किसी को नहीं पता कि इस वायरस की प्रकृति कैसी है और ये कैसे व्यवहार करता है. इसने महामारी के खिलाफ जंग को और ज्यादा चुनौतीपूर्ण बना दिया है.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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