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पैंगोंग त्सो का मामला निपटा लेकिन दूसरे लद्दाख के तनाव वाले प्वाइंट से सैन्य वापसी पर पीछे हटा चीन

नई दिल्ली: लद्दाख में भारत-चीन के बीच गतिरोध, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2020 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की तरफ से वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अतिक्रमण के साथ हुई थी, को करीब एक साल पूरा हो गया है. लद्दाख में सर्दी घट चुकी है, क्षेत्र में हाड़ कंपा देने वाली सर्दी के बीच पहली बार अग्रिम चौकियों पर भारतीय और चीनी सैनिकों की तैनाती पर भी अब पर्दा पड़ चुका है और पैंगांग त्सो सहित टकराव वाले दो प्वाइंट पर सैन्य वापसी प्रक्रिया पूरी हो गई है.

हालांकि, गतिरोध वाली अन्य जगहों देपसांग के मैदान, डेमचोक, गोगरा और हॉट स्प्रिंग में एलएसी की भारतीय धारणा के मुताबिक सीमा के इस तरफ पीएलए की निरंतर तैनाती चिंता का विषय बनी हुई है.

भारत और चीन इस समय कोर कमांडर स्तरीय वार्ता के अगले दौर की तारीखों को अंतिम रूप देने के लिए एक-दूसरे के संपर्क में हैं, जो तनाव शुरू होने के बाद से बातचीत का दसवां दौर होगा.

रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों ने कहा कि वार्ता के लिए प्रस्तावित तारीखों पर चीन की तरफ से जवाब आना बाकी है. उन्होंने बताया कि वार्ता के लिए 9 अप्रैल की तारीख पर चर्चा हो रही है.

किन मुद्दों पर चर्चा होनी के बारे में बात करते हुए सूत्रों ने ऊपर बताए गए टकराव वाले बिंदुओं की ओर इशारा किया, और यह भी बताया कि साझा फैसले के मद्देनजर पैंगांग त्सो के दक्षिणी और उत्तरी तट से सैन्य वापसी पूरी हो चुकी है. उन्होंने कहा कि टकराव के अन्य प्वाइंट पर 20 फरवरी को हुई कोर कमांडर स्तर की आखिरी बैठक में भी फोकस रहा था.

शीर्ष सूत्रों ने दिप्रिंट को पूर्व में बताया था कि 16 घंटे की बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने लद्दाख में आगे सैन्य वापसी के लिए व्यापक पैरामीटर तय करने पर सहमति जताई. चर्चा में शामिल टीमों को अपने संबंधित उच्च अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम के बारे में अवगत कराने के बाद फिर से बैठक करनी थी.

भारत में, चाइना स्टडी ग्रुप, जो पूर्वी सीमा पर सरकार को सलाह देता है, ने बातचीत के नतीजों पर विचार-विमर्श किया और आगे के दिशा-निर्देश तय किए.

पिछले साल से अब तक भारत और चीन ने गलवान घाटी, जहां जून में झड़प के दौरान 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए थे और पैंगांग त्सो में सैन्य वापसी प्रक्रिया पूरी कर ली है. पैंगांग त्सो में यह प्रक्रिया इस साल के शुरू में पूरी हुई.

जब भारत और चीन दक्षिणी तट से सैनिकों को वापसी पर सहमत हुए, तो रक्षा और सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े तमाम लोगों का मानना था कि भारत को सौदेबाजी के लिहाज से अहम—कैलाश रेंज—पर अपना दावा नहीं छोड़ना चाहिए, जिसे पिछले साल अगस्त में देर रात तक चले एक अभियान के दौरान कब्जे में लेकर चीनियों को हैरत में डाल दिया गया था.

जिन क्षेत्रों में गतिरोध जारी है, उनमें से गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स में तनाव घटाने और सैन्य वापसी पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन गई थी लेकिन इस पर पूरी तौर पर अब तक अमल नहीं हो पाया है.

देपसांग मैदानों और डेमचोक में कब्जा भी एक मुद्दा बना हुआ है, जहां अप्रैल 2020 से काफी पहले से ही तनाव बना हुआ है.


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गोगरा

गोगरा में चीनी घुसपैठ पिछले साल मई में हुई थी, जब पीएलए ने पैंगोंग त्सो में एलएसी का उल्लंघन किया और गलवान घाटी में तनाव उत्पन्न हो गया.

भारतीय सैनिक पैट्रोलिंग पॉइंट (पीपी)-15 तक गश्त किया करते थे, जिसे गोगरा पोस्ट के नाम से जाना जाता है. हालांकि, चीन ने एलएसी पर भारतीय धारणा के मुताबिक तीन किलोमीटर अंदर तक अपने सैनिकों की एक पलटन तैनात कर दी थी.

इसके साथ ही, उन्होंने एलएसी पर अपनी ओर भी अच्छी-खासी तैनाती कर दी जो एलएसी के इस तरफ घुसपैठ करने वाले सैनिकों को एक मजबूत बैक-अप के उद्देश्य से की गई थी.

चीन ने जहां भारत की तरफ से निर्धारित एलएसी के भीतर कुछ टेंट स्थापित कर लिए थे वहीं भारतीयों ने इसका जवाब एकदम ‘आमने-सामने तैनाती’ के जरिये दिया, जिसमें भारतीयों ने पीएलए के जवानों की क्षमता के मुताबिक ही ठीक उनके सामने अपने तंबू गाड़ दिए.

15 जून 2020 को गलवान घाटी में हुए संघर्ष के मद्देनजर सैन्य वापसी पर बनी सहमति के बाद चीनियों को एलएसी पर अपने इलाके में लौटना था.

हालांकि कुछ हद तक तौ सैन्य वापसी हुई है लेकिन उन्होंने इस पर पूरी तरह अमल नहीं किया, और एलएसी पर भारतीय इलाके में अपने कुछ सैनिकों को अब भी तैनात कर रखा है.

हॉट स्प्रिंग्स

गोगरा की तरह ही चीनी सैनिक यहां भी एलएसी के इधर घुस आए थे और पीपी-17 और पीपी-17ए को अवरुद्ध कर उन्होंने हॉट स्प्रिंग्स के एक बड़े इलाके में अपना दबदबा कायम कर लिया था.

जुलाई में चीनी इस क्षेत्र से पीछे हटने को तैयार हो गए, लेकिन फिर से समझौते को पूरी तरह लागू नहीं किया गया.

सैन्य वापसी पर जुलाई में वार्ता गतिरोध शुरू होने के बाद इसे तोड़ने की यह ऐसी दूसरी कवायद थी. इससे पहले 6 जून को कोर कमांडर-स्तर के अधिकारियों के बीच हुई पहली बैठक चीनियों की तरफ से गलवान घाटी पर समझौते का पालन न किए जाने और एक झड़प होने के कारण नाकाम हो गई थी. झड़प में बीस भारतीय सैनिक शहीद हुए थे जबकि चीन ने अपने केवल चार जवानों के मारे जाने की पुष्टि की है. यह 1975 के बाद पहली ऐसी घटना थी जिसमें भारत-चीन सीमा पर झड़प के दौरान मौतें हुईं.

वार्ता के दूसरे दौर के मद्देनजर चीनियों ने एकमात्र जिस जगह पर सैन्य वापसी के वादे पर पूरी तरह अमल किया है, गलवान घाटी ही है.

सूत्रों ने पिछले साल मई में कहा था कि चीनियों को अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर वापस लौटने में सिर्फ 5-6 घंटे का समय लगेगा, बशर्ते वे वास्तव में इसका इरादा रखते हों.

देपसांग मैदान

नार्थ सब-सेक्टर में आने वाला देपसांग मैदान ऐसा प्रमुख क्षेत्र है जो चीन की मजबूत सैन्य गतिविधियों का गवाह बना और गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स की तुलना में ज्यादा व्यापक रणनीतिक असर वाला है.

देपसांग में तो 2013 में ही उस समय तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई थी जब पीएलए ने रणनीतिक रूप से खासे अहम दौलत बेग ओल्डी बेस के नजदीकी क्षेत्र में 18 किलोमीटर अंदर तक घुसपैठ की थी. 2017 में डोकलाम गतिरोध के दौरान यहां तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया था.

सूत्रों ने बताया कि देपसांग मैदान का मुद्दा चीन की तरफ से भारतीय गश्ती दलों को रोके जाने और उन्हें पांच बिंदुओं—10, 11, 11ए, 12 और 13 तक पहुंचने से रोकने से जुड़ा है.

इन जगहों तक पहुंचने के लिए भारतीय गश्ती दल के जवानों को पैदल रास्ता अपनाना पड़ता है, जो ‘बॉटल नेक’ कहे जाने वाले क्षेत्र से गुजरकर जाते हैं. यह रास्ता काफी संकरा होने के कारण इस पर वाहन नहीं गुजर सकते.

इस रास्ते पर एक किलोमीटर के बाद वाले क्षेत्र को वाई जंक्शन कहते हैं, जहां से दो रास्ते हो जाते है—इनमें से एक पीपी-10, 11, 11A और 12 की ओर जाता है, और दूसरा सीधे पीपी-13 तक.

चीनियों ने इस क्षेत्र में कैमरे लगा रखे हैं और भारतीय गश्ती दल को अपने क्षेत्र में वाहनों के जरिये गश्त से भी रोकते हैं. ऐसे दावे किए जाते रहे हैं कि चीनियों ने भारत इलाके में भी तंबू गाड़ रखे हैं, हालांकि सेना इससे इनकार करती है.

डेमचोक

डेमचोक पर नियंत्रण को लेकर भी मुद्दा बरकरार है. इस क्षेत्र में हमेशा दोनों सेनाओं का आमना-सामना होता रहा है क्योंकि यहां पर एलएसी को लेकर दोनों देशों की धारणाएं अलग-अलग हैं.

चीन पहले से भारतीय चरवाहों के स्थानीय चारागाहों तक आने-जाने पर आपत्ति जताता रहा है और इस क्षेत्र पर अपनी दावेदारी जताता है. भारत इसे अपना इलाका मानता है जबकि चीन ने पिछले कुछ सालों में यहां अपने सैनिकों के स्थायी ठिकाने बना दिए हैं.

लद्दाख में तनाव के ताजा दौर के बाद चीन ने डेमचोक में ‘कुछ अतिक्रमण’ बढ़ाया है और पीएलए ने ‘कुछ’ टेंट लगा दिए हैं.

एक सूत्र ने इसे कोई बड़ी घटना न करार देते हुए कहा, ‘यह क्षेत्र पहले से ही विवादित है. यह पहले भी होता रहा है, लेकिन अप्रैल के बाद से चीनियों ने यहां अपनी स्थिति मजबूत की है.’

भारतीयों को तनाव बढ़ने के बाद यहां पर लगाए गए नए संचार टॉवरों पर भी आपत्ति है, हालांकि, चीन का दावा है कि ये उसके अपने इलाके में लगे हैं.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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