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गे वकील किरपाल को HC जज बनाए जाने के अभी भी खिलाफ है मोदी सरकार, CJI को भी दी जानकारी

नई दिल्ली: एनडीए सरकार ने एक बार फिर, सीनियर एडवोकेट सौरभ किरपाल को दिल्ली हाई कोर्ट का जज बनाए जाने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश पर ऐतराज़ जताया है. दिप्रिंट को यह जानकारी मिली है.

कहा जा रहा है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे के लिखे एक पत्र के जवाब में, केंद्र ने सौरभ किरपाल की बतौर जज नियुक्ति को लेकर, इस आधार पर अपनी आशंकाएं जताई हैं कि उनका पुरुष साथी एक विदेशी नागरिक है.

अपने पत्र के ज़रिए सीजेआई ने, किरपाल पर अतिरिक्त जानकारी तलब की थी. इससे पहले 2 मार्च को कॉलेजियम की एक बैठक हुई थी, जिसमें सीनियर एडवोकेट के नाम पर विचार विमर्श किया गया था.

किरपाल का नाम, जो एक गे इंसान के तौर पर सामने आए हैं, पहले 2017 में दिल्ली एचसी कॉलेजियम द्वारा सुझाया गया था, जिसकी अध्यक्ष उस समय की कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल थीं. शीर्ष अदालत की कॉलेजियम ने भी प्रस्ताव का अनुमोदन कर दिया था लेकिन उनके पार्टनर के बारे में केंद्र की ओर से आपत्ति जताने के बाद, एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए इस प्रस्ताव को टाल दिया गया.

सीजेआई ने अपने पत्र में, जैसा कि दिप्रिंट ने पहले खबर दी थी, केंद्र से अतिरिक्त जानकारी मांगी थी, ताकि किरपाल के नाम को लेकर उसकी आपत्तियों पर कुछ और स्पष्टता मिल सके. इस पर सरकार ने कहा है कि किरपाल का पार्टनर जो एक यूरोपियन है, स्विस एम्बेसी का कर्मचारी है और इस नौकरी से पहले, वो स्विटज़रलैंड स्थित एक गैर-लाभकारी संस्था में काम कर रहा था.

इससे पहले अपने एक पत्र के साथ, सरकार ने उसके और उसके विदेशी साथियों के फोटोग्राफ्स नत्थी किए थे, जो उसके फेसबुक अकाउंट से लिए गए थे. सरकार ने कहा था कि ये पार्टनर, सुरक्षा के लिए एक खतरा हो सकता है.

इस बार भी सरकार ने किरपाल के यौन संबंधी रुझान को लेकर अपनी ख़ामोशी बरकरार रखी है.

अब, ये शीर्ष अदालत के कॉलेजियम के ऊपर है कि सीनियर एडवोकेट के लिए की गई सिफारिश पर, वो क्या अंतिम फैसला लेती है.

प्रक्रिया ज्ञापन (एमओपी) के तहत, अगर कॉलेजियम सरकार के रुख को स्वीकार नहीं करती और किरपाल को जज नियुक्त करने के, अपने फैसले पर कायम रहती है, तो केंद्र के पास उनके नाम को अधिसूचित करने के अलावा कोई रास्ता नहीं होगा. ज़्यादा से ज़्यादा सरकार उनकी नियुक्ति में देरी कर सकती है लेकिन उसे खारिज नहीं कर सकती.

लेकिन, सीजेआई बोबडे की अध्यक्षता में कॉलेजियम की बैठक आज बुलाई गई है. ऐसा कोई लिखित नियम नहीं है, जो निवर्तमान सीजेआई को कॉलेजियम बैठक बुलाने से रोकता हो लेकिन परंपरा के अनुसार एक बार राष्ट्रपति नए सीजेआई की नियुक्ति के वॉरंट पर दस्तखत कर दें, तो फिर वो बैठक नहीं बुलाते हैं.


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कॉलेजियम ने किरपाल पर निर्णय 4 बार टाला है

किरपाल के नाम पर 2 मार्च को हुई बैठक में चर्चा की गई, जिसमें सीजेआई बोबडे और कॉलेजियम के दो अन्य सदस्य, न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना और आरएफ नरीमन शामिल थे लेकिन कॉलेजियम ने सरकार से इनपुट हासिल होने तक अपना निर्णय टाल दिया.

दिल्ली हाई कोर्ट की ओर से सर्वसम्मति से, उनके नाम की सिफारिश किए जाने के बाद, ये चौथी बार है कि किरपाल के नाम को टाला गया है.

उनका नाम 23 में से 18 प्रस्तावों में शामिल था, जो काफी समय से कॉलेजियम के पास लंबित थे और जिनपर 2 मार्च को चर्चा की गई. इनमें कुछ नाम ऐसे भी थे, जिन्हें केंद्र ने पुनर्विचार के लिए वापस भेजा था या जिन्हें कॉलेजियम ने, अधिक जानकारी हासिल करने के लिए टाल दिया था.

एससी किरपाल की नियुक्ति पर कोई ठोस फैसला नहीं ले पाया है, हालांकि सितंबर 2018 में उसने धारा 377 की व्याख्या की थी, जिसमें दो समलैंगिक वयस्कों के बीच, सहमति से सेक्स को अपराध करार दिया गया था.

पिछले सितंबर में, दिप्रिंट को दिए एक इंटरव्यू में, किरपाल ने कहा था कि उन्हें लगता है कि शायद उनके यौन रुझान की वजह से ही, तीन-सदस्यीय कॉलेजियम ने उनकी नियुक्ति पर कोई फैसला नहीं लिया है. वो पहली बार था जब एडवोकेट ने इस विषय पर बोला था.

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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