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ममता बनर्जी नंदीग्राम में हार गईं, फिर भी कल लेंगी सीएम पद की शपथ; ऐसे होगा संभव

नई दिल्ली: ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में, नंदीग्राम सीट से हार गईं, लेकिन फिर भी वो 5 मई को, एक और कार्यकाल के लिए, मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रही हैं.

ममता, जिन्होंने अपनी तृणमूल कांग्रेस पार्टी को, राज्य में ज़बर्दस्त चुनावी जीत दिलाई है, नंदीग्राम में अपने पुराने सहयोगी और बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी से हार गईं. चुनाव क्षेत्र में मतगणना के दौरान, घटनाक्रम में कई बार पेंच आने के बाद, निर्वाचन आयोग ने रविवार रात इसकी घोषणा कर दी. टीएमसी प्रमुख ने कहा है, कि वो इस फैसले को कोर्ट में चुनौती देंगी.

लेकिन, सीट से हारने के बाद भी, संविधान बनर्जी को इजाज़त देता है, कि वो एक और कार्यकाल के लिए, मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाल सकती हैं.

धारा 164 (4) के अनुसार, एक अनिर्वाचित मंत्री सीएम बन सकता है, लेकिन पद संभालने के छह महीने के अंदर, उसे चुनाव जीतकर आना होगा.


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क्या कहती है धारा 164 (4)

संविधान की धारा 164(4) एक ग़ैर-विधायक को, मंत्री परिषद में पद ग्रहण करने की अनुमति देती है, लेकिन केवल छह महीने के लिए. इन छह महीनों के भीतर, उस व्यक्ति को विधानसभा या विधान परिषद में चुनकर आना होगा, अन्यथा वो मंत्री नहीं बने रह सकेगा. परिषद की सीटें विधानसभा सदस्यों द्वारा, अप्रत्यक्ष मतदान के ज़रिए भरी जाती हैं.

धारा में कहा गया है: ‘कोई मंत्री जो लगातार छह महीने की किसी अवधि में, राज्य की विधायिका का सदस्य नहीं है, उस अवधि के पूरा होने पर, मंत्री नहीं रह पाएगा.’

इसलिए, ये प्रावधान बनर्जी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की इजाज़त देता है, लेकिन छह महीने के भीतर, उन्हें राज्य के किसी भी चुनाव क्षेत्र से उप-चुनाव जीतना होगा. चूंकि पश्चिम बंगाल में कोई विधान परिषद नहीं है, इसलिए उनके पास उप-चुनाव ही एकमात्र रास्ता है. अगर वो ऐसा नहीं कर पातीं, तो उन्हें अपना पद छोड़ना होगा.

ये पहली बार नहीं है कि बनर्जी इस तरह से पदभार संभाल रही हैं. 2011 में जब टीएमसी प्रमुख ने पहली बार, पश्चिम बंगाल के सीएम की शपथ ली थी, तो उन्होंने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन कुछ महीने बाद, वो भवानीपुर से चुन ली गईं.


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ग़ैर-विधायकों के पद संभालने पर SC

संविधान विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफा ने भी इस प्रावधान का हवाला दिया, और दिप्रिंट से कहा कि ‘उनके सीएम पद की शपथ लेने पर कोई क़ानूनी प्रतिबंध नहीं है’.

उनका कहना था, ‘ग़ैर-विधायक के मुख्यमंत्री बनने पर कोई पाबंदी नहीं है. धारा 164(4) के अनुसार वो छह महीने के अंदर चुनकर आ सकती हैं. दो सीटें ख़ाली हैं और वो आसानी से, उनमें से एक जीत सकती हैं’.

इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने भी लगातार ये कहा है, कि धारा 164(4) के मद्देनज़र, कोई भी व्यक्ति जो विधायिका का सदस्य नहीं है, अल्प अवधि के लिए मंत्री नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन नियुक्ति के बाद, अगर छह महीने के अंदर, वो चुनकर नहीं आ पातीं, तो वो मंत्री नहीं रहेंगी.

लेकिन, कोर्ट ने ये भी स्पष्ट किया कि छह महीने की इस धारा को ‘एक ही व्यक्ति के लिए, निर्वाचित हुए बिना, बार बार इस्तेमाल किए जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती’.

संसद के संदर्भ में भी, इसी तरह का प्रावधान मौजूद है. धारा 75(5) के अनुसार, कोई ‘मंत्री जो लगातार छह महीने की किसी भी अवधि के लिए, संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं है, उस अवधि के पूरा हो जाने के बाद, मंत्री नहीं रहेगा’.


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अन्य मंत्री जिन्होंने धारा 164(4) का सहारा लिया

पिछले कुछ सालों में कई राजनेताओं ने, जो विधायक नहीं थे, मुख्यमंत्री पद की शपथ ली है. योगी आदित्यनाथ विधान सभा के निर्वाचित सदस्य (विधायक) नहीं थे, जब उन्होंने मार्च 2017 में, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला.

उन्हें सितंबर 2017 में, विधान परिषद के लिए चुना गया, जिससे वो राज्य विधायिका के सदस्य बन गए, और अपने पद पर बने रहे.

बल्कि, यूपी के उप-मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य, तथा परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह भी, इसी प्रकार से चुने गए.

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी, कोई निर्वाचित मंत्री नहीं थे, जब उन्होंने 28 मार्च 2019 को शपथ ली. अपना सीएम पद बनाए रखने के लिए, वो पिछले साल मई में ही, महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य बने.

इस बीच, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी, इसी संवैधानिक प्रावधान के ज़रिए, बतौर सीएम अपने पद पर बने हुए हैं. कुमार ने आख़िरी चुनाव 1985 में लड़ा था, जिसे 35 वर्ष से अधिक हो गए हैं.

जब बीजेपी-जेडी(यू) गठबंधन ने, 2005 विधान सभा चुनाव जीते, तो कुमार ने सीएम पद की शपथ ली, लेकिन वो किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे. बाद में निर्धारित समय के भीतर, 2006 के शुरू में वो विधान परिषद के लिए चुने गए. उसके बाद से, वो परिषद के लिए ही चुने जाते रहे हैं.


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