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तेल का खेल देखो, तेल की मार देखो- कैसे फिसला इसकी धार में मिडिल क्लास देखो

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर दो चीजें काफी वायरल हुईं. एक तो था भारत के पड़ोसी देशों में पेट्रोल की कीमतों का चार्ट और दूसरा था देश में पेट्रोल की कीमतें बढ़ने के विरोध में अटल बिहारी वाजपेयी की संसद तक बैलगाड़ी यात्रा. इन दोनों ने खूब धमाल मचाया क्योंकि इस समय देश के ज्यादातर हिस्सों में पेट्रोल की कीमतें सौ रुपए से ऊपर चल रही हैं. डीजल भी 90 रुपए से ऊपर है. इसके अलावा जनता के लिए एक और तकलीफदेह बात यह हो रही है कि खाने के तेलों की कीमतें अनाप-शनाप हो गई हैं.

कोविड महामारी से जूझ रहे देश के सामने ये दो समस्याएं मुंह बाये खड़ी हैं. इन्होंने मिडल क्लास को झकझोर दिया है तो गरीबों से उनका सरसों तेल उनकी पहुंच से बाहर कर दिया. यह साधारण सा तेल एक बार तो 200 रुपए प्रति लीटर के डरावने स्तर को छू गया था. सरकार की ओर से कोई बड़ा कदम नहीं उठा लेकिन खाद्य सचिव ने एक बैठक जरूर की जिससे कीमतें थोड़ी गिरीं लेकिन इतनी भी नहीं कि कोई राहत मिले. आज भी सरसों का तेल 175 रुपए प्रति लीटर से कम नहीं है. मूंगफली का तेल जो महाराष्ट्र और गुजरात में खाने का मुख्य तेल है, 220 रुपए से 250 रुपए लीटर तक जा पहुंचा जो भैंस के घी की कीमत से थोड़ा ही कम है.


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तेल के बढ़े दाम से फिसल गया मिडल क्लास 

खाद्य तेलों की कीमतों में इस बार की तेजी अभूतपूर्व है. इस बार देश की राजधानी दिल्ली में सरसों, सोया, वनस्पति और पाम ऑयल की कीमतें सीधे 30 प्रतिशत बढ़ गईं जबकि सूरजमुखी का तेल तो 40 प्रतिशत तक जा बढ़ा. इससे देश के मिडल क्लास को भारी झटका लगा और उसका बजट लड़खड़ा गया. दूसरी ओर हलवाइयों ने पाम ऑयल जैसे तेल का धड़ल्ले से इस्तेमाल करना शुरू कर दिया ताकि उनकी लागत न बढ़े. इसके पहले यह कॉस्मेटिक्स, साबुन, पैकेज्ड फूड में ही इस्तेमाल होता था.

तेल के साथ एक ही समस्या है और वह यह कि दोनों ही यानी कच्चा तेल और खाद्य तेल बड़े पैमाने पर इम्पोर्ट होते हैं. भारत में पिछले एक दशक में खाद्य तेलों की खपत दुगनी हो गई है जिसका नतीजा है कि हम अपनी जरूरत का लगभग 70 प्रतिशत आयात करते हैं. दूसरी ओर कच्चा तेल भी 80 प्रतिशत तक आयात करते हैं. ये दो आयटम हमारे इम्पोर्ट बिल का बड़ा हिस्सा हैं और इनसे हमारे बजट का बड़ा भाग खा जाते हैं.

लेकिन कहानी का एक और पहलू है. वह यह कि देश में तिलहनों के कारोबार में सटोरिये जमकर सट्टा लगाते रहे हैं. जिससे तिलहनों की कीमतें अनाप-शनाप ढंग से बढ़ती गईं. सरकार ने सरसों की फॉर्वर्ड ट्रेडिंग को मंजूरी दे रखी है जिसका जमकर फायदा सटोरियों ने उठाया और सरकार बेबस देखती रही. इसके पीछे एक कारण यह भी था कि देश में पाम ऑयल के बढ़ते इम्पोर्ट को कम करने के ख्याल से सरकार ने उस पर 35.75 प्रतिशत टैक्स लगा दिया था. दूसरी ओर सोयाबीन और उसके तेल के आयात पर 35 प्रतिशत की ड्यूटी रही. इसका असर दूसरे तेलों पर भी पड़ा और वे भी महंगे हो गए. इसके अलावा मलेशिया और इंडोनेशिया में पाम ऑयल की कीमतों में कोविड के कारण बढ़ोतरी हो गई जिसका असर हमारे यहां भी दिखा जबकि रूस और उक्रेन में सूखे मौसम की वज़ह से सूरजमुखी का उत्पादन प्रभावित हो गया जिससे उसकी कीमतें सारी दुनिया में बढ़ गईं. भारत में इस बार सरसों की फसल कमजोर रही जिससे बाज़ार में तेजी की अवधारणा रही. इसका सीधा असर उसके तेल के दाम पर पड़ा जिसका फायदा निर्माताओं और सटोरियों ने जमकर उठाया और कीमतें आसमान पर पहुंचा दी.

जुलाई महीने की शुरूआत में सरकार ने तेलों की बढ़ती कीमतों को थामने के लिए पाम ऑयल पर ड्यूटी घटाकर 30.25 प्रतिशत कर दी. लेकिन जैसी आशंका थी कि सरकार की इस छूट को बड़ी कंपनियां बड़ी आसानी से खा गईं. एक और बात रही कि सरकार ने सिर्फ पाम ऑयल पर ही ड्यूटी कम की, अन्य तेलों पर नहीं. इससे ग्राहकों को कोई राहत नहीं मिल पाई. समस्या यह है कि तेलों की कीमतों को नियंत्रित करने में सरकार विफल होती दिख रही है क्योंकि एक ओर तो उसका खजाना खाली है और दूसरी ओर यह उसकी वरीयता सूची में नहीं है.


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तेल के बढ़े दामों पर विपक्षी दल की चुप्पी कुछ कहती है

खजाने को भरने के लिए सरकार ने एक ओर तो खाद्य तेलों पर कस्टम ड्यूटी का सहारा लिया है तो दूसरी ओर कच्चे तेल पर भी. आज देश में पेट्रोल की कीमतों में सिर्फ 40 प्रतिशत ही कच्चे माल की कीमत है, शेष राशि का बहुत बड़ा हिस्सा केन्द्र और राज्य सरकारों के खजाने में जाता है. जहां केन्द्र सरकार 34 प्रतिशत तक एक्साइज ड्यूटी लगाती है तो वहीं राज्य सरकारें लगभग 15-20 प्रतिशत तक वैट वसूल रही हैं. महाराष्ट्र में तो यह 38 प्रतिशत से भी ज्यादा है. यानी सरकारें खजाना खाली होने का बहाना लेकर ग्राहकों की जेब ढीली करने में लगी हुईं हैं. उन्हें राजस्व इकट्ठा करने का दूसरा स्रोत नहीं दिख रहा है और इसलिए वह इस पर अपना सारा जोर लगा रही हैं. केन्द्र सरकार ने 2020-21 में 3.89 लाख करोड़ रुपए इस टैक्स से कमाया है जबकि राज्य सरकारों ने 1.35 लाख करोड़ रुपए. यही कारण है कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने कभी इस मुद्दे को ज़ोर-शोर से नहीं उठाया.

जनता की मांग रही है कि पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में लाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है. वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने जरूर यह कहा कि इस पर चर्चा होनी चाहिए. लेकिन इसके आगे बात कभी नहीं बढ़ी. इसका नतीजा है कि भारत में आज पेट्रोल पड़ोसी देशों से कहीं ज्यादा दाम में मिल रहा है.

पाकिस्तान में, जिसकी हर चीज में हमसे पिछड़ जाने की चर्चा अक्सर होती है, पेट्रोल भारतीय मुद्रा के हिसाब से महज 52 रुपए लीटर है जबकि पड़ोसी नेपाल में 80 रुपए जबकि श्रीलंका में 68 रुपए प्रति लीटर है. चीन में भी पेट्रोल 88 रुपए प्रति लीटर है. दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कोई देश कच्चे तेल का उत्पादन नहीं करता और ज्यादा हिस्सा इम्पोर्ट ही करता है.

डीजल के बढ़े दामों ने ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री को तो चोट पहुंचाई ही है, देश में महंगाई बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. ट्रांसपोर्टेशन महंगी हो जाने के कारण उत्पादित वस्तुओं की कीमतें तो बढ़ी ही हैं, खेतों से आने वाले अनाज और फल-सब्जियों पर भी इसका असर पड़ा है. देश में मुद्रास्फीति की दर बढ़ने का यह बहुत बड़ा कारण है. पिछले तीन महीनों में डीजल की कीमतों में 25 रुपए तक का इजाफा हुआ जिससे ट्रैक्टरों के किराये भी बढ़ गए. इन ट्रैक्टरों से फल-सब्जियों की ढुलाई का काम बड़े पैमाने पर होता है. इनका भाड़ा लगभग दुगना हो गया है जिससे किसानों को अपना माल शहरों और मंडियों में भेजने में काफी लागत आ रही है. इतना ही नहीं मुर्गों, मछलियों, मांस वगैरह की कीमतें भी बढ़ गईं.

इन सबसे देश में खाने-पीने की चीजों के दाम जरूरत से ज्यादा बढ़ गए हैं. खाद्य मुद्रास्फीति एक बार फिर मुंह बाये खड़ी है. भारत की खादय मुद्रास्फीति तो सात महीने के अधिकतम पर जा पहुंची थी लेकिन फिलहाल इसमें थोड़ी गिरावट आई है.

अब रिजर्व बैंक के सामने यह चुनौती है कि वह बढ़ी हुई मुद्रास्फीति का मुकाबला करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाए या औद्योगिक विकास का ध्यान रखते हुए इसे वहीं रहने दे. इस समय देश में खपत घट रही है और उसे बढ़ाना जरूरी है कि ताकि मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को सहारा मिल सके. ऐसे में ब्याज दरें बढ़ाना उचित नहीं होगा.

बहरहाल तेलों की महंगाई का इलाज सिर्फ सरकार के पास है. यह जरूर है कि ओपेक देशों द्वारा तेलों का उत्पादन बढ़ाने से भारत को कच्चा तेल सस्ते में मिल सकता है. अगस्त महीने से इसकी उम्मीद की जा सकती है. तब तक इंतज़ार करें.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं.)


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