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बंगाल के इस फैक्ट्री का मालिक चुनावी मैदान में, कर्मचारी बोले- वेतन नहीं, सिर्फ ‘तारीख पे तारीख’ मिल रही

हावड़ा (पश्चिम बंगाल) : हिंदी फिल्म अभिनेता सनी देओल और पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्थित एक कारखाने में काम करने वाले सुनील भौमिक के बीच क्या समानता है? दोनों को ‘तारीख पे तारीख’ को लेकर शिकायत है, अंतर बस ये है कि एक को रील लाइफ में तो दूसरे को रियल लाइफ में इसे झेलना पड़ रहा है.

सनी देओल ने 1993 में आई फिल्म ‘दामिनी’ में इस चर्चित डायलॉग के साथ न्यायिक प्रणाली पर अपना पूरा गुस्सा उतारा था, जबकि भौमिक पिछले आठ महीनों से अपने वेतन के लिए ‘तारीख पे तारीख’ का संकट झेल रहे हैं.

भौमिक पिछले माह तक तृणमूल के पूर्व सांसद के परिवार के स्वामित्व वाली शालीमार स्टील वर्क्स के तहत चलने वाले एक फर्नीचर कारखाने में काम करते थे. कंपनी के निदेशकों में से एक नंदिता चौधरी इस चुनाव में टीएमसी के टिकट पर हावड़ा दक्षिण सीट से चुनाव लड़ रही हैं. हावड़ा में 10 अप्रैल को मतदान होना है.

कारखाने के श्रमिकों का कहना है कि चौधरी के पास चुनाव लड़ने के लिए पैसा है, लेकिन उनका बकाया चुकाने के लिए कुछ नहीं है.

भौमिक ने कहा, ‘उनके पास विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए पैसा है, लेकिन मजदूरों के वेतन का भुगतान करने के लिए पैसा नहीं है, जो भूखों मरने के कगार पर हैं. हमने उनके कारखानों में इतने सालों तक काम किया है. हाल यह हो गया है कि न तो हम फैक्ट्री छोड़ सकते हैं और न ही कोई दूसरा काम कर सकते हैं क्योंकि हमारा पैसा अटका पड़ा है. हम अपना घर चलाने के लिए कितना पैसा उधार लें?’

अपनी भविष्य निधि और एलआईसी बचत का पैसा पूरी तरह खत्म हो जाने के बाद अब मित्रों और रिश्तेदारों से पैसे उधार लेकर काम चला रहे भौमिक ने कहा, ‘हमें पिछले आठ महीनों से केवल तारीख के बाद तारीख और आश्वासन ही मिल रहे हैं, लेकिन वेतन नहीं मिला है. हर बार भुगतान के लिए एक नई तारीख मिल जाती है. हम जीवन कैसे चलाएंगे? हमने अपनी सारी बचत पूंजी खत्म कर दी. अपने बच्चों की फीस का भुगतान कहां से करेंगे?’

इसी कंपनी के लोहे के फ्रेम बनाने वाले एक कारखाने में काम करने वाले भौमिक के साथी मोहम्मद फखरुद्दीन की कहानी भी कुछ ऐसी है.

उन्हें पिछले चार महीनों से वेतन का भुगतान नहीं किया गया है. कई श्रमिकों ने कारखाने में काम करना बंद कर दिया है, जिसका एक हिस्सा पिछले कुछ वर्षों से बंद ही पड़ा है.

फखरुद्दीन ने बताया, ‘पिछले चार महीनों से हमारा जीवन बदतर हो गया है. हमारे पास घर चलाने के लिए पैसे नहीं हैं. कोविड के दौरान किसी ने हमें उधार पैसा तक नहीं दिया. फैक्ट्री मालिक हमें रोजगार दें या फिर हमारा वेतन चुकाएं.’

भौमिक और फखरुद्दीन की तरह तमाम ऐसे मजदूर हैं जिन्हें कई महीनों से उनका वेतन नहीं मिला है.

शालीमार स्टील वर्क्स की दो मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट हैं— एक मॉड्यूलर फर्नीचर के लिए और दूसरी लोहे के फ्रेम बनाने बनाने वाली. कंपनी 1956 से चल रही है.

चौधरी यहां पर भाजपा प्रत्याशी रंतिदेव सेनगुप्ता के खिलाफ चुनाव मैदान में हैं, जो लोकप्रिय बंगाली दैनिक बार्टमैन के पूर्व संपादक और पार्टी की बंगाल बौद्धिक इकाई के प्रमुख हैं.

वेतन न चुकाए जाने के संबंध में टिप्पणी के लिए दिप्रिंट ने कई बार फोन कॉल के जरिये चौधरी से संपर्क साधा लेकिन यह रिपोर्ट प्रकाशित किए जाने के समय तक उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.


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पारिवारिक कारोबार

चौधरी पूर्व टीएमसी सांसद स्वर्गीय अंबिका बनर्जी की बेटी हैं, जिन्होंने 1982 से 2006 तक हावड़ा सेंट्रल विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया था. बनर्जी टीएमसी में शामिल होने से पहले तीन दशक तक कांग्रेस के साथ रहे थे. वह 2009 में टीएमसी के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए थे. 1996 से 2006 तक वाम मोर्चा शासन के दौरान राज्य विधानसभा में नेता विपक्षी दल भी रहे थे. 2013 में कैंसर के कारण उनकी मृत्यु हो गई.

जब तक बनर्जी खुद इसे संभाल रहे थे तब तक कारखाने सुचारू ढंग से चलते रहे लेकिन उनकी मृत्यु के बाद आयरन फैक्ट्री का एक हिस्सा बंद हो गया.

बनर्जी परिवार के तीन सदस्य कंपनी के निदेशक हैं- मुनमुन बनर्जी (उनके भाई की पत्नी), अयान बनर्जी (उनके भाई का बेटा) और नंदिता चौधरी.

भौमिक का कहना है, ‘कंपनी में तीन निदेशक हैं, एक कंपनी चलाना चाहता है, दूसरा नहीं चाहता है. लेकिन इस सब में हमारी क्या गलती है? जब हमारा धैर्य जवाब दे गया तो हमने काम करना बंद कर दिया.

फर्नीचर फैक्ट्री के एक अन्य श्रमिक बिस्वजीत मंडल, जिनकी मजदूरी भी बकाया है, ने दिप्रिंट से कहा, ‘हमने 30 मार्च को आखिरी बार अपने वेतन के बारे में निदेशकों से बात की थी. निदेशकों में से एक बकाया भुगतान निपटाना चाहते थे, लेकिन बाकी दोनों ने कहा कि मामला अब अदालत में पहुंचेगा.’

कंपनी के एक मैनेजर, जो अपना नाम नहीं जाहिर करना चाहते, ने दिप्रिंट को बताया कि मालिकों को कंपनी चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है और जब तक अंबिका जी जीवित थे तो ऐसी स्थिति कभी नहीं आई.

कलकत्ता यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर, सुकांतो भट्टाचार्य ने कहा, ‘हावड़ा-हुगली क्षेत्र में कई कारखाने विभिन्न कारणों से बंद हो चुके हैं, मसलन प्रमोटर्स की कोई रुचि न होना, आधुनिकीकरण और कारोबार के अनुकूल माहौल का अभाव. मजदूर अपना पैसा मांग रहे हैं, उन्हें कोई नया काम भी नहीं मिल रहा है. इस सबको बदलने की जरूरत है.’

हावड़ा दक्षिण में चुनाव अभियान गर्माया

हावड़ा दक्षिण में चुनाव प्रचार अभियान गर्म हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को हावड़ा के एक निर्वाचन क्षेत्र में रैली की थी. पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी हावड़ा के उलुबेरिया में प्रचार अभियान में हिस्सा लिया था.

भाजपा अपनी जीत के लिए हावड़ा दक्षिण की 40 फीसदी हिंदी भाषी आबादी पर नजरें टिकाए है, वहीं 2016 और 2019 के चुनाव में यहां जीत हासिल करने वाली टीएमसी को 50 फीसदी से ज्यादा बंगालियों और 18 फीसदी मुसलमानों की मदद से फिर सफलता मिलने का पूरा भरोसा है.

भाजपा उम्मीदवार सेनगुप्ता कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अच्छे सहयोगियों में शुमार थे. लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद वह भाजपा में शामिल हो गए.

पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में हावड़ा से सेनगुप्ता को पूर्व फुटबॉलर और टीएमसी के तत्कालीन सांसद प्रसून बनर्जी के खिलाफ मैदान में उतारा था. सेनगुप्ता को 4,73,000 से अधिक वोट मिले, लेकिन वह एक लाख से अधिक वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे. भाजपा के सूत्रों ने बताया वह शुरू में विधानसभा चुनाव लड़ने को तैयार नहीं थे, लेकिन आरएसएस के दखल के बाद इस पर राजी हो गए.

सेनगुप्ता का कहना है, ‘लड़ाई मतदान के दिन पर इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारा बूथ प्रबंधन कितना कारगर रहता है और हम टीएमसी के गुंडों से निपटने में कितने सक्षम हो पाते हैं.’

टीएमसी सूत्रों ने बताया कि चौधरी की नजरें अपने पिता की विरासत और पिछले पांच दशकों में मतदाताओं के साथ बने उनके पिता के रिश्तों को भुनाने पर टिकी हुई हैं.

टीएमसी के जिला अध्यक्ष भास्कर भट्टाचार्य ने कहा कि ये सीट टीएमसी का गढ़ है और अंबिका बनर्जी की विरासत चौधरी की जीत सुनिश्चित करने में मददगार होगी और भाजपा को कोई मौका नहीं मिलेगा.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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