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हाथरस से लखीमपुर तक सिर्फ BJP की गलतियों की ताक में विपक्ष, तय नहीं कर पा रहा एजेंडा

लखीमपुर खीरी कांड और उसकी बेशर्म लीपापोती की भाजपा की कोशिशों ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष को एकजुट होने और अपनी सियासत को आगे बढ़ाने के लिए एक एजेंडा दे दिया है. इसने सत्ता से वंचित दलों में जान फूंक दी है, जिसकी उन्हें बेहद जरूरत थी.

हाथरस और सोनभद्र में हुए कांडों की तरह लखीमपुर कांड ने भी उन्हें वांछित तेजी प्रदान की है. लेकिन इसे भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि उनके पास अपना कोई एजेंडा, मतदाताओं को दिखाने के लिए कोई सपना, कोई स्पष्ट योजना नहीं है. सत्ताधारियों की आलोचना और विरोध करना किसी भी विपक्ष का अधिकार भी है और कर्तव्य भी, लेकिन बस इतने से काम नहीं चल सकता. इसे वह सहारे के तौर पर भले इस्तेमाल करे लेकिन अपनी कोई खासियत न बना पाना न तो चुस्त सियासत मानी जा सकती है, और न चतुर चुनावी चाल.

ऐसा लगता है कि चुनाव का सामना करने जा रहे प्रदेश में कांग्रेस की प्रियंका गांधी वाड्रा और राहुल गांधी से लेकर सपा के अखिलेश यादव, बसपा की मायावती और रालोद के जयंत चौधरी तक तमाम विपक्षी नेता अगला ‘मौका’ हासिल करने के लिए नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकारों पर निर्भर हैं. ऐसा ही लगता है मानो विपक्ष खुद कोई सक्रिय चिंतन करने की जगह हाथ पर हाथ धरे बैठा इंतजार करता रहता है कि भाजपा उसे कोई अगला ‘उपहार’ दे तो वह हरकत में आए.


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आस बंधाता लखीमपुर

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र के वाहनों के काफिले से कथित रूप से कुचलकर चार किसानों के मारे जाने के बाद से प्रदेश में हालात बिगड़े हुए हैं और विपक्ष हमलावर है. इस संकट की कुछ-कुछ तस्वीरें काफी उत्तेजक हैं- पुलिस से टक्कर लेती प्रियंका की या गेस्ट हाउस में झाड़ू लगाती प्रियंका की, पुलिस से हाथापाई करते दीपेंद्र हुड्डा की, घटनास्थल पर जा पहुंचे जयंत चौधरी की या आशीष मिश्र को गिरफ्तार करने की जगह ‘फूलों का गुलदस्ता’ भेंट करने का आरोप पुलिस पर लगाते अखिलेश यादव की.

इन सबने जबरदस्त राजनीतिक असर डाला, जिसमें विपक्ष द्वारा सटीक समय पर की गई कार्रवाई का तो योगदान था ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हठीली चुप्पी का भी कम योगदान नहीं था. विपक्ष ने जिस तरह इस कांड को मुद्दा बनाए रखा उसने सोनभद्र और हाथरस के कांडों की याद दिला दी, जब योगी आदित्यनाथ फिसलते नज़र आए थे और उनके विरोधियों को उछालने के लिए एक मुद्दा मिल गया था. गांधी परिवार वाले हाथरस पहुंचने और वहां गांव से बाहर चार लोगों द्वारा कथित बलात्कार के पखवारे भर बाद चल बसी 19 साल की एक दलित लड़की के परिवार से मिलने में सफल रहे थे.

मायावती और अखिलेश ने भी योगी सरकार को बचाव की मुद्रा में लाने और अपनी आवाज़ बुलंद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. वे तब भी उतने ही मुखर हुए थे जब सोनभद्र जिले में जमीन के एक झगड़े में 10 लोग मारे गए थे और कई अन्य घायल हो गए थे. इनके अलावा वे नये नागरिकता कानून को लेकर विवाद में, और कानून-व्यवस्था के मामले में योगी सरकार के सवालिया रिकॉर्ड को लेकर भी काफी सक्रिय रहे.


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घटना-दर-घटना विरोध

हर विपक्ष इंतजार करता है कि सरकार गलती करे और वह इसका इस्तेमाल करके फायदा उठाए. लेकिन यह उत्तर प्रदेश और शायद राष्ट्रीय स्तर पर भी एकमात्र रणनीति बन गई है. ऐसा लगता है मानो विपक्ष नीम बेहोशी में है और तभी जागता है जब भाजपा कोई गड़बड़ी करती है और इसके बाद वह फिर बेहोश हो जाता है. भाजपा और मोदी विरोध ही कुछ विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस का एकमात्र हथियार बन गया है. लेकिन ऐसा हथियार कारगर नहीं हो सकता.

मतदाता चाहता है कि राजनीतिक दल एक स्पष्ट खाका, एक सुलझी हुई सोच और एक सुसंगत वादा पेश करें. 2014 में उसने मोदी और यूपीए के 10 साल के शासन के बरक्स उनके ‘विजन’ को वोट दिया था.

शासक दल की गलतियों और उनके खिलाफ लोगों की भावनाएं उभारने की रणनीति तभी कारगर होती है जब उसकी सरकार बेहद अलोकप्रिय हो जाती है और मतदाता उससे छुटकारा पाना चाहते हैं. 2018 में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में शायद ऐसा ही हुआ था. भाजपा के विरोधियों की बदकिस्मती से इस पार्टी या प्रधानमंत्री या योगी के मामले में भी अभी वह स्थिति नहीं आई है. अपनी सियासत के लिए घटना-दर-घटना छलांग लगाना मतदाताओं को यही संदेश देता है कि आपके पास विचारों का टोटा पड़ गया है और आप अपना राजनीतिक दांव खेलने के लिए सिर्फ मोदी की भाजपा पर निर्भर हैं. इस नीति का नतीजा यह होता है कि एजेंडा केवल भाजपा तय करती है और बाकी सब बस यह इंतजार करते रहते हैं कि वह अगली गलती करे.

विपक्ष ने उत्तर प्रदेश में अपनी आवाज़ तो हासिल कर ली है लेकिन कुछ महीने बाद ही जबकि वहां चुनाव होने वाले हैं, उसे अपनी भाषा और अपना एजेंडा भी तय करने की जरूरत है.

(व्यक्त विचार निजी हैं)

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