RKant
A solo, offbeat and responsible blog run by Rkant, voted among the best bloggers in world.

जबरन इक़रार, यातना- गुरुग्राम स्कूल हत्या मामले में पुलिस ने स्कूल कंडक्टर को कैसे ‘फंसाया’

नई दिल्ली : झूठे सबूत गढ़ना, केस डायरियों में ग़लत प्रविष्टियां, झूठे बयान लेने के लिए दबाव बनाना, और एक फर्ज़ी क़बूलनामा- हरियाणा पुलिस ने इस तरह गुरुग्राम के एक निजी स्कूल के बस कंडक्टर को, 7 साल के एक लड़के की हत्या में कथित रूप से फंसाया.

सीबीआई चार्जशीट के अनुसार, 2017 के इस मामले में चार पुलिसकर्मियों ने ‘अशोक कुमार को अभियुक्त के तौर पर ग़लत ढंग से फंसाने के इरादे से, जानबूझ कर झूठे सबूत गढ़े, और ग़लत दस्तावेज़ तैयार किए’.

8 सितंबर 2017 को, दूसरी क्लास का एक बच्चा स्कूल परिसर में, गला कटी हुई अवस्था में पाया गया. हत्या का मामला दर्ज हो जाने के बाद, स्थानीय पुलिस ने उसी दिन एक स्कूल बस कंडक्टर, अशोक कुमार को गिरफ्तार कर लिया.

लेकिन, व्यापक आक्रोश के बाद, केस को सीबीआई के हवाले कर दिया गया, जिसने उसी स्कूल के 11वीं क्लास के एक छात्र को, हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

28 फरवरी 2018 को सीबीआई ने, कुमार के ख़िलाफ एक क्लोज़र रिपोर्ट दाख़िल की, जिसमें उसे इस मामले में क्लीन चिट दे दी गई, जबकि अपराधी किशोर के खिलाफ चार्जशीट दायर कर दी गई.

स्कूल टीचर्स, कर्मचारियों, अशोक कुमार के सहकर्मियों, तथा फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स के बयानात के सहारे, सीबीआई ने अपनी पूरक चार्जशीट में विस्तार से बताया, कि बस कंडक्टर को फंसाने के लिए, हरियाणा पुलिस ने सारी कहानी ‘गढ़ी’ थी.

तीन साल पहले, तत्कालीन एसीपी बीरेम सिंह समेत, पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ अलग से जांच शुरू करने के बाद, केंद्रीय एजेंसी ने जनवरी में सोनीपत की एक विशेष सीबीआई कोर्ट के सामने, इस मामले में अपनी पूरक चार्जशीट दायर की.


यह भी पढ़ें: दिल्ली पुलिस के खिलाफ अदालती लड़ाई के एक साल बाद अब घर लौट रहे हैं 36 तबलीगी


ज़ब्ती ज्ञापन और केस डायरियों में हेरफेर

सीबीआ के अनुसार, हरियाणा पुलिस ने कुमार से पूछताछ, या उसकी गिरफ्तारी से बहुत पहले ही, ज़ब्ती ज्ञापन तैयार करके उसमें कुमार का नाम शामिल कर दिया था. ये ज्ञापन 8 सितंबर को दोपहर 3 बजे तैयार किया गया, लेकिन कुमार की गिरफ्तारी उसी दिन रात 9 बजे दिखाई गई.

चार्जशीट से पता चला, ‘इससे साफतौर पर साबित होता है, कि अभियुक्त पुलिस अधिकारियों ने बिना किसी सबूत के, उसे झूठे तौर पर फंसाने का मन बना लिया था. इसी उद्देश्य के तहत, उन्होंने कुमार के खिलाफ सबूत प्लांट किए’.

जांच में ये भी पता चला कि जिस पुलिस अधिकारी ने, कथित रूप से ज़ब्ती ज्ञापन तैया किया था, वो मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद ही नहीं था. एक वैज्ञानिक सहायक ने, जो फॉरेंसिक सबूत उठाने के लिए मौक़ा-ए-वारदात पर गया था, सीबीआई से इसकी पुष्टि की थी.

इसके अलावा, सीबीआई ने ये भी कहा, कि सबूतों में हेरफेर करने के लिए, पीड़ित के ख़ून से सने स्कूल बैग को, मौक़ा-ए-वारदात से हटाकर, पहले बच्चे के क्लासरूम, और फिर कॉनफ्रेंस हाल में ले जाया गया था.

चार्जशीट के अनुसार, कुमार की गिरफ्तारी को साबित करने के लिए, बाद में बहुत सी केस डायरियां तैयार की गईं. इन डायरियों में ग़लत तथ्य दर्ज थे, और महत्वपूर्ण गतिविधियां, जो सीसीटीवी फुटेज में रिकॉर्ड थीं, वो या तो ग़ायब थीं, या ब्लैंक थीं.

त्रुटिपूर्ण जांच के एक उदाहरण के तौर पर, सीबीआई ने बताया कि उन केस डायरियों में से एक में, पुलिस ने दावा किया कि कुमार के कपड़े हत्या के दिन ज़ब्त किए गए थे. लेकिन, बस कंडक्टर अगले दिन अपने मीडिया इंटरव्यू के दौरान, वही कपड़े पहने हुए था.

चार्जशीट में कहा गया, ‘सीबीआई जांच में पता चला, कि आरोपित पुलिस अधिकारियों ने झूठे सबूत गढ़े, मामले की केस डायरियों में हेरफेर करके, ग़लत अधिकारिक रिकॉर्ड्स तैयार किए, और अशोक कुमार को झूठे तरीक़े से फंसाने के लिए, केस डायरियों में ग़लत और झूठे तथ्य शामिल किए, ताकि अस्ली अपराधी को बचाया जा सके, जो कि केस डायरियों के विश्लेषण से साफ ज़ाहिर है’.

बस कंडक्टर और गवाहों पर दबाव डालकर, झूठे बयान दर्ज किए

सीबीआई ने कहा कि कुमार के इक़बालिया बयान, जिनमें उसने हत्या का आरोप स्वीकार किया था, उसे शारीरिक यातना देकर हासिल किए गए थे, और उसने वास्तव में कभी अपना अपराध क़बूल नहीं किया था.

उसने आगे कहा कि ये बयानात, पुलिस अधिकारियों ने बाद की एक तारीख़, 11 सितंबर 2017 को, घटना के तीन दिन बाद तैयार किए थे.

इसकी तसदीक़ एक महिला सिपाही ने भी की, जिसने सीबीआई को बताया कि उसने, पहले से दस्तख़त किए हुए एक कोरे कागज़ पर, एक इक़बालिया बयान लिखा था. सीबीआई ने ये भी कहा कि कोई भी पुलिसकर्मी, जिसने कुमार के इक़बाले जुर्म के दौरान, वहां मौजूद होने का दावा किया था, वास्तव में वहां नहीं था.

इसके अलावा, सीबीआई ने हरियाणा पुलिस के इस आरोप की भी धज्जियां उड़ा दीं, कि अशोक कुमार ने, अपराध के हथियार- एक चाक़ू- को बस की टूल किट में छुपा दिया था. उसने कहा कि इस हथियार को, अपराधी किशोर ने वारदात से एक दिन पहले ख़रीदा था.

कुछ स्कूल कर्मचारियों और एक फॉरेंसिक एक्सपर्ट के बयानों के आधार पर, सीबीआई ने कहा कि कुमार ने पीड़ित पर यौन हमला नहीं किया, जैसा कि हरियाणा पुलिस ने आरोप लगाया था. बल्कि उसे एक स्कूल टीचर और एक अन्य कर्मचारी ने, बच्चे को एक गाड़ी तक ले जाने में, सहायता करने के लिए बुलाया था, ताकि उसे जल्दी से पास के एक अस्पताल में ले जा जाया सके.

एक स्कूल कर्मचारी ने, जिसने पहले कुमार के ख़िलाफ़ एक बयान दिया था, सीबीआई को बताया कि हरियाणा पुलिस ने, उसे इसके लिए मजबूर कर दिया था.

पेरेंट्स ने हरियाणा सरकार के फैसले को चुनौती दी

पुलिसकर्मियों के खिलाफ इतने गंभीर आरोपों के बावजूद, विशेष सीबीआई कोर्ट उनके ख़िलाफ कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ा पाई है, चूंकि राज्य सरकार ने उनके ख़िलाफ, मुक़दमा चलाने की मंज़ूरी नहीं दी है.

हरियाणा गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, राजीव अरोड़ा के दस्तख़त से जारी एक आदेश में कहा गया, कि सीबीआई ने जिन सबूतों पर भरोसा किया है, उनमें पुलिस दस्तावेज़ों में कुछ ‘अशुद्धियां और विसंगियां’ पाई गईं थीं, लेकिन उनसे ये साबित नहीं होता, कि अधिकारियों की किसी व्यक्ति को फंसाने की, कोई आपराधिक मंशा या मन:स्थिति थी.

इस आदेश को 22 फरवरी को, सोनीपत सीबीआई कोर्ट के सामने पेश किया गया, जिसने केस को 19 मार्च तक के लिए स्थगित कर दिया, जब पीड़ित के परिवार ने कहा कि वो इसे, पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती देना चाहते हैं.

परिवार की ओर से वकील सुशील टेकरीवाल ने दिप्रिंट से कहा, कि इस आदेश को रद्द कराने के लिए, बच्चे के पिता ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की है.

टेकरीवाल ने कहा, ‘इस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का उल्लंघन किया है, जिनमें कहा गया है कि लोक सेवक को, ये सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण इसलिए दिया जाता है, कि वो तुच्छ मुक़दमेबाज़ियों का शिकार न बने. किसी राज्य सरकार को सबूतों को इस तरीक़े से नहीं देखना चाहिए, जैसा कि इस केस में हरियाणा सरकार ने किया है. ये साफतौर पर पुलिसकर्मियों की ओर से, कर्त्तव्यों में कोताही का मामला है’.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: दिल्ली की अदालत ने उमर खालिद के ‘कबूलनामे’ की खबरों पर जताया ऐतराज़, रिपोर्टिंग के मूल सिद्धांत याद दिलाए


 

You may also like...

Leave a Reply

%d bloggers like this: