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‘जमीन के नीचे है प्रेशर बम’- क्यों जंगल जाने से डर रहे हैं झारखंड के करीब 40 गांव के लोग

गुमला (झारखंड): महेंद्र महतो बीते 27 फरवरी को गुमला जिले के मड़वा जंगल में मवेशी चराने गए थे. जंगल में थोड़ा आगे बढ़ने के बाद जैसे ही उन्होंने अगला कदम बढ़ाया, इसके बाद उनकी आंखें दो दिन बाद वहां से 120 किमी दूर रांची के मेडिका अस्पताल में खुली. उनका एक पैर उड़ चुका था.

महेंद्र बताते हैं कि वहां विस्फोट हुआ क्योंकि जमीन के नीचे बम लगा हुआ था.

इस घटना से दो दिन पहले यानि 25 फरवरी को गुमला जिले के ही रोरेद जंगल में नक्सलियों की तलाश में सुरक्षाबल निकले थे. यहां भी विस्फोट हुआ और सीआरपीएफ के जवान रोबिंस कुमार का एक पैर उड़ गया.

बीते 4 मार्च को चाईबासा जंगल में हुए बारूदी सुरंग विस्फोट में तीन पुलिसकर्मी मारे गए थे. यही नहीं, सात अप्रैल को डीजीपी नीरज सिन्हा चाईबासा पहुंचकर ग्रामीणों से मिले. पुलिसकर्मियों से मिल उन्होंने रणनीति पर चर्चा की और देर शाम उनके लौटते ही माओवादियों ने इसी इलाके में सड़क निर्माण में लगे चार ट्रैक्टर जला दिए.

इधर गुमला जिले के लगभग 40 गांवों में नक्सलियों ने घूम-घूम कर ग्रामीणों से कहा है कि वह जंगल में न जाएं. क्योंकि वहां उन्होंने जमीन के नीचे बम लगाया हुआ है. इस सूचना के बाद इन गांवों के लोगों का जीवन ही बदल गया है.

फोटो: आनंद दत्ता

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लोगों ने जंगल जाना छोड़ा

सात अप्रैल की तपती दुपहरी में सुकलदेव कोरवा (37) अपनी दो बकरियों के साथ घर पर आराम कर रहे थे. रांची से लगभग 112 किलोमीटर दूर सुकराहातू गांव के अधिकतर लोग उनकी ही तरह काफी हद तक जंगल पर निर्भर हैं. लेकिन बीते एक महीने से वह न तो जंगल से लकड़ी ला पा रहे हैं, न ही मवेशियों को चराने ले जा रहे हैं.

फोटो: आनंद दत्ता

सुकलदेव विलुप्तप्राय आदिम जनजाति ‘कोरवा’ से आते हैं. इस गांव में उनके अलावा 14 परिवार और हैं जो इसी जनजाति से हैं.

इसी गांव के हरिनंदन खेरवार (65) और रघुनंदन सिंह (68) को पहले इसकी जानकारी नहीं थी. स्थानीय अखबार में खबर छपने के बाद उन्होंने भी जंगल जाना छोड़ दिया है.

सुकराहातू से तीन किलोमीटर दूर कुकरुंजा गांव के सुनील सोरेन अपना घर बना रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘सांचा में ढाल कर खुद ईंटा बनाया, खुद दिवाल खड़ा कर दिया. लेकिन अब ऊपर खपरैल डालने के लिए लकड़ी ही नहीं है. क्योंकि जंगल जाना मना है.’

सुनील अब सोच रहे हैं कि 25,000 रुपए का इंतजाम कहां से होगा ताकि प्लास्टिक का पाइप लगाकर वह अपना घर तैयार कर सकें.

अभी महुआ चुनने का समय है. बड़ी संख्या में ग्रामीण महुआ चुनते हैं और उसे बेचकर आजीविका चलाते हैं. मवेशियों को भी चराने और सूखी लकड़ियां लेने वह जंगल जाते हैं. खेती के अलावा जंगल ही उनकी आजीविका का मुख्य साधन है. लेकिन डर से उन्होंने जंगल जाना पूरी तरह बंद कर दिया है.

गर्मी की वजह से खेतों में घास लगभग सूख चुकी हैं. ऐसे में ग्रामीण बड़ी मुश्किल से अपने मवेशियों को चारा दे पा रहे हैं. जंगल के बीच से कई नदियां भी गुजरती हैं, वो इसका भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं.

माओवादियों के खिलाफ पुलिस लड़ रही है वहीं पुलिसिया कार्रवाई का माओवादी जवाब दे रहे हैं. इस बीस उस इलाके में रहने वाले आदिवासी और गैर-आदिवासी लोग पिस रहे हैं.

फोटो: आनंद दत्ता

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‘जनता प्रभावित तो मैं कुछ नहीं कर सकता’

गुमला विधानसभा और विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र के कुछ गांव प्रभावित इलाकों में आते हैं.

दिप्रिंट ने जब झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के गुमला से विधायक भूषण तिर्की से ग्रामीणों को इस हालात से उबारने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘अब अगर नक्सली फरमान सुना रहे हैं तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं. रही बात सरकार तक बात पहुंचाने की, तो इसके लिए तंत्र है. उस तंत्र के माध्यम से सीएम तक बात पहुंच ही गई होगी.’

तिर्की ने कहा, ‘अगर जनता प्रभावित हो रही है तो मैं सीधे तौर पर कुछ नहीं कर सकता हूं.’

वहीं जेएमएम से ही विशुनपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक चमरा लिंडा ने इसी सवाल पर कहा, ‘मैं सीएम तक इसकी जानकारी पहुंचाता हूं. साथ ही एसपी से भी इस मसले पर बैठक करने जा रहा हूं.’

उन्होंने कहा, ‘जिन इलाकों में यह फरमान जारी किया गया है वहां तो आदिवासियों का जीवन ही 80 प्रतिशत तक जंगल और पहाड़ पर निर्भर है.’

‘मेरा सुझाव यह भी है कि पुलिस अभियान चलाकर यह पता लगाए कि कहां तक सिक्योर एरिया है, कहां प्रेशर बॉम्ब है. साथ ही सिक्योर एरिया के बारे में ग्रामीणों को जानकारी दी जाए. ताकि वह उन इलाकों का इस्तेमाल कर सकें.’


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पुलिस-माओवादी संघर्ष में बीते दो सालों में 58 लोगों की हो चुकी है मौत

इस साल माओवादियों के बिछाए आईईडी ब्लास्ट से पूरे राज्य में तीन ग्रामीणों की मौत हो चुकी है. वहीं सुरक्षाबल के चार जवान भी मारे गए हैं. वहीं बीते साल राज्यभर में कुल 364 नक्सली वारदात दर्ज किए गए हैं. वहीं इस साल जनवरी महीने में कुल 40 और फरवरी में कुल 37 मामले दर्ज हुए हैं.

झारखंड पुलिस की ओर से दी गई एक और जानकारी के मुताबिक साल 2019 और 20 में पुलिस-माओवादी संघर्ष में कुल 58 आम नागरिकों की मौत हुई है. इन्हीं दो वर्षों के दौरान 43 माओवादी और 15 पुलिसकर्मियों ने अपनी जान गंवाई है.

झारखंड पुलिस के स्पेशल ब्रांच के अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया कि बीते महीने में गुमला बाजार के एक ही दुकान से 200 से अधिक टिफिन बॉक्स की खरीदारी हुई है. आशंका जताई जा रही है कि इसे माओवादियों ने ही खरीदा है. वह इसका इस्तेमाल प्रेशर बम बनाने में करते हैं.

नक्सलियों ने गुमला के रोरेद, उरू, बारडीह, गानी, कोचागानी, कुटमा छापरटोली, चांदगो, कोटाम, सकरा, सरगांव, कुकरूंजा, मनातू, ओड़ामार, कोचागानी, रोघाडीह, सकसरी, ऊपर डुमरी, केरागानी, केवना, कोलदा, कुयोग, मड़वा, सिविल, तबेला, घुसरी, रोघाडीह, पांकी, हरिनाखाड़, आंजन, ऊपर आंजन सहित 40 गांव के लोगों को पशुओं को चराने एवं लकड़ी चुनने के लिए जंगल में घुसने से मना कर दिया है.


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15 लाख का ईनामी माओवादी बुद्धेश्वर का दस्ता है सक्रिय

गुमला के एसपी एचपी. जनार्दनन ने दिप्रिंट को बताया, ‘गुमला, लोहरदगा, लातेहार के जंगलों में माओवादियों ने आईईडी लगा रखा है. पहले वो पुलिस को देखकर ब्लास्ट करते थे. चूंकि अब उन्हें आम पब्लिक का सपोर्ट नहीं मिल पा रहा है, इसलिए अब प्रेशर आईईडी का इस्तेमाल कर रहे हैं.’

उन्होंने कहा, ‘ग्रामीणों से इनपुट मिलने के बाद कुछ इलाके में डीमाइनिंग (बॉम्ब का पता लगाना और उसे डिफ्यूज करना) का काम शुरू किया गया है. हालांकि प्रोसेस फिलहाल काफी धीमा है.’

एसपी ने यह भी बताया, ‘इस इलाके में माओवादी के रीजनल कमेटी मेंबर बुद्धेश्वर उरांव और देवेंद्र गंझू का दस्ता सक्रिय है.’ वहीं स्पेशल ब्रांच के इनपुट पर उन्होंने कहा, ‘वह छुट्टी पर थे, लौटने के बाद इसकी जानकारी लेंगे.’

प्रभात खबर के स्थानीय पत्रकार दुर्जेय पासवान ने दिप्रिंट को बताया, ‘ग्रामीणों से मिली जानकारी के मुताबिक बुद्धेश्वर ने फिलहाल रोरेद जंगल में बम प्लांट कर खुद को दूसरी तरफ सुरक्षित कर लिया है.’ वहीं झारखंड पुलिस की वेबसाइट के मुताबिक, बुद्धेश्वर पर सरकार ने 15 लाख रुपए का ईनाम भी घोषित कर रखा है.

(आनंद दत्ता स्वतंत्र पत्रकार हैं)


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