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कोविड मोर्चे, चुनावी दृश्य और सुर्ख़ियों से ‘ग़ायब’ हैं बीजेपी के तेजस्वी सूर्या

नई दिल्ली, बेंगलुरू: कहां हैं तेजस्वी सूर्या, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के तेज़ तर्रार युवा नेता, जो पहली बार में ही 2019 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद से, अपने विवादास्पद भाषणों और टिप्पणियों से, सुर्ख़ियां लिखने वालों को व्यस्त रखते थे?

वो पश्चिम बंगाल और असम चुनावों के प्रचार में मुश्किल से ही नज़र आए. और जहां भारतीय युवा कांग्रेस (आईवाईसी) अध्यक्ष, श्रीनिवास बीवी के कोविड राहत कार्यों से, सोशल मीडिया गूंज रहा है, वहीं बीजेपी युवा विंग अध्यक्ष सूर्या, बातचीत से ग़ायब ही दिख रहे हैं.

सूर्या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे हैं. बस वो ख़ुद ही अपने इंटरव्यू पोस्ट कर रहे हैं, जिन्हें वो प्रोफेशनल्स और डॉक्टरों के साथ करते हैं, जिनमें कोविड-19, और भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाईएम) की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी दी जाती है.

लेकिन कोविड तबाही के बीच, युवा विपक्षी नेताओं की सक्रियता ने, सूर्या को पूरी तरह ढांक कर रख दिया है.

वो अब उस शोहरत से भी बहुत दूर हैं, जो उन्होंने पिछले साल के ज़्यादातर हिस्से में, बना कर रखी हुई थी.

दिप्रिंट से बात करते हुए सूर्या ने कहा, कि जो उनपर सवाल खड़े कर रहे हैं, उन्हें उनके तथा बीजेवाईएम के, सोशल मीडिया हैंडल्स देखने चाहिएं

उनका ये भी कहना है कि ये आरोप बिल्कुल ग़लत है, कि पार्टी ने उन्हें ख़ामोश रहने के लिए कहा है. उन्होंने कहा, ‘आज तक, पार्टी ने एक बार भी मुझसे ये नहीं कहा है, कि मैंने जो कुछ भी कहा, वो सही है या ग़लत है’. उन्होंने आगे कहा, ‘मैं अपने चुनाव क्षेत्र के विधायी कार्य में व्यस्त हूं. इसके अलावा ये भी है, कि मुझे पार्टी के अंदर बोलने, और बदलाव कराने के ज़्यादा मौक़े मिलते हैं, इसलिए मुझे बाहर ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती’.

कर्नाटक में बढ़ते मामलों के बारे में बात करते हुए सूर्या ने आगे कहा, कि कोविड की दूसरी लहर ने, दुनिया के दूसरे हिस्सों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है.

उन्होंने कहा, ‘लेकिन पिछले साल के मुक़ाबले, हर मामले में हमारा राज्य और देश, महामारी से निपटने में बेहतर सुसज्जित हैं. पिछले साल,कर्नाटक में क़रीब 1,000 ऑक्सीजन बेड्स थे. इस साल 19,700 बेड्स हैं. लेकिन मामले इतने अधिक बढ़ गए हैं, कि संसाधनों पर बेहद दबाव है. दुनिया का कोई भी देश इतनी बड़ी संख्या को नहीं संभाल सकता, और इसलिए हमने लॉकडाउन लगाकर सही किया है. लॉकडाउन के 14 दिनों की अवधि पूरी हो जाए, तो संक्रमण की चेन टूट जाएगी’.

एक बीजेपी नेता ने भी सूर्या की बातों का समर्थन किया, और कहा कि बेंगलुरू साउथ के अपने चुनाव क्षेत्र का ध्यान रखने के लिए, सांसद कुछ समय से कर्नाटक में बने हुए हैं.

नाम न बताने की शर्त पर नेता ने आगे कहा, कि सांसद के अस्पतालों तथा अन्य स्थानों के दौरे, बेंगलुरू तक ही सीमित हैं.

बीजेपी नेता ने कहा, ‘वो सांसद हैं और जानते हैं, कि पहले उन्हें अपने चुनाव क्षेत्र को संतुष्ट करना है. यही वजह है कि वो वहां बने हुए हैं, और अगर आप उनके सोशल मीडिया पोस्ट भी देखें, तो पाएंगे कि वो कर्नाटक के लिए रेम्डिसिविर का बंदोबस्त कर रहे हैं, या बेंगलुरू में अस्पतालों आदि का दौरा कर रहे हैं’. उन्होंने आगे कहा, ‘उनका ध्यान अपने सूबे पर है, और इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है. लेकिन युवा अध्यक्ष होने के नाते, उन्हें दूसरी जगहों पर जाने की भी ज़रूरत है, चूंकि उसे एक सकारात्मक संदेश जाएगा’.

लेकिन जिस जगह सूर्या की ग़ैर-मौजूदगी खटक रही है, वो है सोशल मीडिया, एक ऐसा माध्यम जिसे उन्होंने अतीत में, अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है.

ऐसे में जब कोविड-19 की दूसरी लहर ने, देश में तबाही मचाई हुई है, आईवाईसी अध्यक्ष श्रीनिवास बीवी, और आप विधायक दिलीप पाण्डे हीरो बनकर सामने आए हैं, चूंकि भारी संख्या में लोग सोशल मीडिया पर, इस जोड़ी से मदद की गुहार लगा रहे हैं.

भारतीय जनता युवा मोर्चा (बीजेवाईएम), जिसके सूर्या मुखिया हैं, तब हरकत में आया जब 18 अप्रैल को पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने, सभी प्रदेश इकाइयों और मोर्चों को निर्देश दिया, कि ‘तुरंत बिना किसी देरी के कोरोना के खिलाफ, अपना प्रचार और पहलक़दमियां शुरू कर दें’.

और जब बीजेवाईएम ने बुद्धवार को सोशल मीडिया पर #बीजेवाईएमडॉक्टरहेल्पलाइन लॉन्च की, तो उसका उदघाटन नड्डा ने किया, सूर्या ने नहीं.

एक बीजेवाईएम कार्यकर्ता ने सूर्या की ‘अनुपस्थिति’ का बचाव किया. कार्यकर्ता ने कहा, ‘उन्हें सोशल मीडिया पर या अन्यथा दिखने की ज़रूरत नहीं है. जो मायने रखता है वो काम है. वो अनगिनत समन्वय बैठकों में रहते हैं, राष्ट्रीय टीम के साथ, विभिन्न क्षेत्रीय टीमों, यहां तक कि ज़िला टीमों के साथ भी’.

‘वो तय करते हैं कि राहत कार्यों को लेकर क्या किया जाना है, और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठकें करते हैं, वो सुनिश्चित करते हैं कि बीजेवाईएम, एक विशाल इकाई की तरह, और साथ मिलकर काम करे. सिर्फ इसलिए कि कोई उसे सोशल मीडिया पर नहीं डाल रहा है, इसका मतलब ये नहीं है कि वो काम नहीं कर रहे हैं’.

लेकिन एक अन्य बीजेपी कार्यकर्ता ने स्वीकार किया, कि कोविड के मामले में पार्टी और उसकी युवा विंग, विपक्ष से पिछड़ गई है.

बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा, ‘हमें अपनी कल्याण योजनाएं बहुत पहले शुरू कर देनी चाहिएं थीं. विपक्ष, ख़ासकर श्रीनिवास ने बहुत पहले सहायता करनी शुरू कर दी, इसलिए हर ओर उनकी चर्चा हो रही है’. कार्यकर्ता ने आगे कहा, ‘साथ ही पिछली बार के विपरीत, जब फोकस भोजन, मास्क और सैनिटाइज़र्स मुहैया कराने पर था, इस बार ये ऑक्सीजन, बिस्तर, और दवाएं हैं, जो हमारे नहीं बल्कि सरकार के हाथ में हैं. हमारी पार्टी सत्ता में हैं इसलिए स्वाभाविक रूप से, हमें आलोचना चुननी पड़ेगी, लेकिन पार्टी कार्यकर्ता के नाते, हमारे पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है’.


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चुनाव प्रचार से ग़ायब

दूसरी कोविड लहर के देश से टकराने से पहले ही, पश्चिम बंगाल के हाई-प्रोफाइल चुनावों में, सूर्या की ग़ैर-मौजूदगी ने सबका ध्यान आकर्षित किया था, हालांकि तमिलनाडु में वो ज़रूर दिखाई पड़े थे.

उनकी ग़ैर-मौजूदगी ज़्यादा इसलिए भी खली, क्योंकि पिछले साल अक्तूबर में चुनावों से पहले, उन्होंने पश्चिम बंगाल और बिहार तक में, आक्रामक प्रचार किया था, दोनों ऐसे राज्य हैं जिनसे उनका कोई नाता नहीं था.

जैसा कि दिप्रिंट ने पिछले साल नवंबर में ख़बर दी थी, ये वो समय था जब बीजेपी आलाकमान ने सूर्या को कुछ अहम ज़िम्मेदारियां दीं थीं, जैसे कि उन्हें युवा विंग का प्रमुख नियुक्त करना, और चुनाव प्रचारों के अलावा, सूचना एवं प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थाई समिति का सदस्य बनाना.

पश्चिम बंगाल में, उस समय नव-नियुक्त बीजेवाईएम अध्यक्ष होने के नाते, पिछले साल अक्तूबर में उन्होंने कई सिलसिलेवार प्रदर्शनों की अगुवाई की थी, जिनमें ‘नबाना चलो (कोलकाता का राज्य सचिवालय) मार्च भी शामिल था, जो अपने गृह राज्य कर्नाटक के बाहर, उनकी पहली विरोध रैली थी.

उन्होंने ममता बनर्जी पर हमला बोला, और उनके प्रशासन को एक ‘फ़ासीवादी सरकार की सबसे ख़राब और उपयुक्त मिसाल’ क़रार दिया.

लेकिन जब मार्च के अंतिम सप्ताह में शुरू होने वाले, आठ चरणों के पश्चिम बंगाल चुनाव के प्रचार ने तेज़ पकड़ी, तो ऐसा लगा जैसे सूर्या, कहीं पृष्ठभूमि में चले गए.

पश्चिम बंगाल के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, कि इसका एक कारण ये था कि उन्हें, एक बड़ा वोट खींचने वाला नेता नहीं समझा गया.

पश्चिम बंगाल के नेता ने कहा, ‘वो मीडिया के लिए एक बड़ा नाम हो सकते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए, वो कोई मायने नहीं रखते थे. जब आपके पास पीएम, गृहमंत्री, और पार्टी अध्यक्ष जैसे वरिष्ठ नेता हों, तो प्रचार उनपर केंद्रित हो जाता है’. नेता ने आगे कहा, ‘अक्तूबर में उन्होंने एक बड़ी रैली की थी, जो ज़रूरी थी क्योंकि उसी समय वो युवा विंग अध्यक्ष बने थे. इस साल के विधान सभा चुनावों में आकर, उन्होंने कुछ छोटी नुक्कड़ सभाएं कीं थीं, लेकिन कुछ बड़ा नहीं किया’.

कर्नाटक के एक बीजेपी नेता ने भी इससे सहमति जताई. नेता ने कहा, ‘हमारा ध्यान सीटें जीतने पर था. दोषारोपण भी ठीक है, लेकिन हमें जो चीज़ चाहिए, वो है अपने पक्ष में अस्ली वोट’. उन्होंने आगे कहा, ‘सूर्या को तमिलनाडु में देखा गया था, जहां उन्होंने ख़ासतौर से पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई के लिए आक्रामक प्रचार किया था’.

एक सीनियर बीजेपी नेता ने कहा, कि पार्टी के अंदर भी बहुत से लोगों को चिंता थी, कि सूर्या के भाषण असम में बीजेपी की संभावनाओं को नुक़सान पहुंचा सकते हैं, जहां पार्टी ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर ख़ामोशी इख़्तियार की हुई थी.

लीडर ने आगे कहा, ‘तमिलनाडु में वो एक स्टार प्रचारक थे, लेकिन उनकी रैलियों का कोई ख़ास असर नहीं दिखा. जहां तक उन्हें इस्तेमाल करने का ताल्लुक़ है, तो तमिलनाडु जैसे सूबों में, लोग मोदी और शाह जैसे नेताओं को सुनने आते हैं’.

कर्नाटक बीजेपी प्रवक्ता कैप्टन गणेश कार्णिक ने दिप्रिंट से कहा, कि उन्हें दक्षिणी राज्यों में इस्तेमाल किया गया, क्योंकि वो वहीं से आते हैं. कार्णिक ने कहा, ‘बंगाल में उन्होंने प्रदर्शनों की अगुवाई की, लेकिन वो चुनाव की तारीख़ें घोषित होने से पहले था. बाद में उन्हें तमिलनाडु और केरल के दक्षिणी राज्यों में देखा गया’. कार्णिक ने आगे कहा, ‘हो सकता है पार्टी के वरिष्ठों को लगा हो, कि तेजस्वी सूर्या के दक्षिण संबंध का इस्तेमाल, दक्षिणी सूबों में फायद पहुंचा सकता है’.


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TN में ज़रा सा दिखे, लेकिन फिर भी विवाद

सूर्या तमिलनाडु में ज़रूर नज़र आए, जहां वो बीजेपी के स्टार प्रचारक थे, लेकिन यहां भी विवादों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा,

उन्हें उस समय शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा, जब अप्रैल के शुरू में उन्होंने डींग हांकी, कि ‘डीएमके के उलट’ उन्होंने, कोयम्बटूर के एक प्रसिद्ध रेस्ट्रॉन्ट में, अपने नाश्ते का बिल अदा किया था.

उन्हें सोशल मीडिया पर ये कहकर ट्रोल किया गया, कि बिल का भुगतान करना ‘एक सामान्य नियम’ था, यहां तक कि रेस्ट्रॉन्ट ने भी ट्वीट किया, कि हर कोई अपने बिल का भुगतान करता है’.

कई महीने पहले, 22 फरवरी को एक रैली में, उन्होंने डीएमके को ‘हिंदू- विरोधी’ क़रार देकर, विवाद खड़ा कर दिया था, और कहा था कि अगर तमिलों को बचे रहना है, तो हिंदुत्व को जीतना होगा. इस बयान से न सिर्फ लोगों की भौंहें तनी थीं, बल्कि तमिलनाडु बीजेपी इकाई ने भी, पसंद नहीं किया था.

लेकिन, एक दूसरे सीनियर बीजेपी नेता ने कहा, सूर्या की अनुपस्थिति का युवा सांसद के भाषणों से कोई संबंध नहीं है. सीनियर बीजेपी नेता ने समझाया, कि 2014 तक बीजेपी प्रचार की कमान कई नेताओं के हाथों में रहती थी.

बीजेपी नेता ने आगे कहा, ‘आज सारा प्रचार केवल एक आदमी पर केंद्रित है, और वो हैं पीएम मोदी. और भी वरिष्ठ नेता हैं जो रैलियों को संबोधित करते हैं, लेकिन फोकस हमेशा पीएम पर रहता है’. उन्होंने ये भी कहा, ‘ये रणनीतिक बदलाव बीजेपी के लिए काम कर गया है, और हम इसी पर चल रहे हैं. इसलिए तेजस्वी सूर्या बैठकों को संबोधित करते हैं या नहीं, इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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